Thursday, July 9, 2009

मकड़ी के जाले



उलझ कर रह गए हो क्यों
शब्दों, रंगों दिशाओं में
हाथ की मुन्दरियों में
गले की मालाओं में
रंग-बिरंगी दस्तारों
बालों की जटाओं में
मिर्च, नींबू, माह, तेल
पीपल की शाखाओं में
घर के आंगन और
तुलसी की बाहों में
कब तक ढ़ूंढ़ते रहोगे मुझको
मकड़ी के इन जालों में
जहां
िकस्मत नहीं रहती
मकडिय़ां रहती हैं
शिकारी मकडिय़ां!

Friday, December 19, 2008

यादों की चादर


फिर गुज़र गए 24 घंटे
इस इंतज़ार में
वो आएंगे मेरे पास
मेरा हाल पूछेंगे और अपना सुनाएंगे
कुछ हौसला देंगे और कुछ ले जाएंगे
एक दूसरे का सहारा बनकर
दिए की लौ बढ़ाएंगे
12 घंटे के मुिश्कल सफ़र के बाद
मंज़िल आधी क़रीब आई
दिए ने अपनी लौ बढ़ाई
मेरे अपने
मेरे पास आए
वह ठहरे मेरे दिल के कमरों में
सोए सीने से लगकर, आराम बिस्तर पर
चिपके रहे रात भर यादों की चादर से
पर जैसे ही
घोड़ पर सवार एक मुसाफिर आया
मुदार् जिस्मों से उसने रोटी मांगी
उठे वो तेज़ी से
सिर ऊंचा करके और
चले गए बग़ैर मिले मुझसे
आंखें नीची करके
रोटी कमाने की जल्दी में
और छोड़ गए मुझको
एक बार फिर
अकेला, मायूस और उदास
इंतज़ार के मुिश्कल लम्हों में
अगले 24 घंटे के लिए