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शाहिद हसन शाहिद
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Thursday, April 15, 2021
बैगम
Tuesday, March 30, 2021
मेरी संपत्ति
Monday, March 15, 2021
पाठशाला
Sunday, February 28, 2021
आतंकी कौवे
Monday, February 15, 2021
अफवाह जीवी
Saturday, January 30, 2021
मासूम पोती

टेलीविजन पर पूरे दिन बलात्कार की खबरें और उनपर पर होने वाली डिबेट सुनते सुनते जब मैं थक गया,तो खुद को तरोताज़ा करने के लिए आंखें बंद करके आराम से सोफे पर पैर फैला कर बैठ कर सोचने लगा कि बाज़ार वाद के बढ़ते प्रभाव और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप ने हमको यह किस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है कि कल तक जिस कन्या को हम देवी की तरह पूजा करते थे, जिस को हम घर की लक्ष्मी कहते थे,जो महिला परिवार की इज़्ज़त व आबरू हुआ करती थी, जिसके कदमों के नीचे बच्चे अपनी जन्नत तलाश करते थे,आज उसी देवी को लोगों ने अपनी हवस की पूर्ती की वस्तु विशेष और प्रयोग करके फेंकने वाला नेपकिन बना दिया है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हमारा नेशनल मीडिया बलात्कार से संबंधी समाचार देश के कोने-कोने से ढूंढ ढूंढ कर क्यों लाता है? फिर उस समाचार को डिबेट के माध्यम से चटकारेदार बनाकर उसमें धार्मिक,राजनीतिक एवं विपक्ष को घेरने के पहलू तलाश करने या किसी एक जाति विशेष के साथ जोड़ कर नेशनल लेवल पर इस प्रकार परोसता है, जैसे यह कोई क्राइम ना होकर देश के विरुद्ध सोचा समझा रचा गया षड्यंत्र हो। नेशनल टीवी द्वारा इस गैर जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के बारे अभी मैं विचार कर ही रहा था कि मेरी पोती जो 6 वर्ष की है मेरे पास आई और मुझे झंझोड़ते हुए कहने लगी- दादू आप सो रहे हैं? मैंने अपनी आंखें खोलते हुए कहा-
Wednesday, January 20, 2021
कहानी मछली की
Sunday, January 10, 2021
फेसला देश का
Sunday, December 20, 2020
मैं भी किसान हूं
Thursday, December 10, 2020
ज़िद्दी बुड्ढा
Monday, November 30, 2020
लव-जिहाद
Friday, November 20, 2020
चटपटी चाट के पत्ते
मेरे दिल के डॉक्टर का कहना है कि मैं नमक और तेज मसालों का सेवन ना करूं क्योंकि मैं ब्लड प्रेशर का मरीज हूं।
हड्डियों का डॉक्टर कहता है कि दही,खट्टी- मीठी चटनी, छिलके दार दालें, दूध से तैयार किसी भी प्रकार के व्यंजन का सेवन ना करूं यह सब यूरिक एसिड उत्पन्न करते हैं। जिस कारण घुटनों का दर्द बढ़ जाता है।
मेरा अनुभव भी यही कहता है कि थोड़ा सा असंतुलित भोजन मेरे दिल की धड़कने तेज करने, सांस फूलने व घुटनों के दर्द को बढ़ाने के लिए प्रर्याप्त होता है।
स्वास्थ्य की इस खराब स्थिति के बावजूद, मैं अपनी फूली हुई सांस व एक वफादार दोस्त की तरह दिन-रात साथ रहने वाले अपने घनिष्ठ मित्र यानी घुटनों के दर्द के साथ नगर के मीना बाजार की मशहूर चाट वाली दुकान पर शाम होते ही पहुंच जाता हूं।
इस दुकान की चाट पापड़ी और गोलगप्पे अपने तीखे स्वाद और तेज़ मसालों के कारण शहर के चटोरों में काफी मशहूर हैं। दुकान पर स्वस्थ लोगों का हर समय मेला लगा रहता है।अब आप सोच रहे होंगे कि इन स्वस्थ चाट के चटोरों के बीच मेरा जैसा अस्वस्थ व्यक्ति जिस पर चाट खाने की पूर्णतः पाबंदी है वह अपने स्वास्थ्य का ख्याल ना रखते हुए चाट की दुकान पर जाने का जोखिम क्यों मोल लेता है? कौनसी ऐसी मजबूरी है कि बगैर चाट खाए यह व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता? चाट की दुकान से उठने वाले मसालों की सुगंध उससे कुछ भी अनर्थ करा सकती है। इन प्रश्नों के उत्तर में, मैं केवल इतना ही कहूंगा की चाट की दुकान पर जाना मेरी कोई मजबूरी नहीं है। मुझे स्वंय पर और अपनी ज़ुबान पर इतना यकीन और भरोसा है कि स्वादिष्ट चाट मेरी सेहत से खिलवाड़ करने का हौसला नहीं कर सकती। मेरे वहां जाने का कारण तो एक तलाश है जो मुझे उन गरीब बच्चों के दरमियान ले जाती है, जो चाट खाने की अपनी चाहत में अमीरों द्वारा फेंके चाट के झूठे पत्ते प्राप्त करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। नंग धड़ंग यह मासूम बच्चे अपनी फ्री स्टाइल कुश्ती दिखाते समय चोट भी खा जाते हैं फिर भी हार नहीं मानते और झूठे पत्तों को अपना हक़ समझते हुए अपनी जद्दोजहद में अपने ही भाइयों के साथ लड़ने का कौशल अमीरों को दिखाते नहीं थकते हैं, जबकि चाट खाने के शौकीन लोग अपने मनोरंजन के लिए अपने चाट के झूठे पत्ते उन बच्चों की ओर रुक-रुक कर फेंकते हैं, ताकि तमाशा जारी रहे। मैं तो केवल एक मुर्दा समाज की तरह यह देखने जाता हूं कि यह गरीब बच्चे कब बड़े होंगे और कब इस बात को समझेंगे कि उनकी गरीबी का मजाक उड़ाने वाले इन अमीरों के लिए वह कब तक मनोरंजन का साधन बनते रहेंगे। अमीरों की सोच में कब बदलाव आएगा यह मैं नहीं जानता या उन में कब कोई ऐसा अमीर पैदा होगा जो इस मनोरंजन के बाद या पहले इन बच्चों को एक चाट का पत्ता खिलाने का हौसला रखता हो यह भी मैैं नहीं जानता, हां...! यह अवश्य जानता हूं कि बच्चे गरीब हैं, पिछड़े हैं और जरूरतमंद हैं।अमीरों को सोचना चाहिए की चाट की खुशबू और चोट का दर्द तो सब को एक ही समान विचलित करता है चाहे वह अमीर हो या गरीब हो।
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Tuesday, November 10, 2020
मुझे इंटरव्यू देना है
Sunday, November 1, 2020
पहचान कौन ?
Tuesday, October 20, 2020
बलात्कार
Saturday, October 10, 2020
कूड़ेदान
Thursday, October 1, 2020
ड्रामेबाज़
Saturday, September 12, 2020
बंदूक की खाली नाल
Thursday, September 10, 2020
बूढ़े हो गए हो तुम
मैंने अपने बेटे से कहा-आज़ादी का अर्थ यह नहीं है जैसा कि तुम समझ रहे हो।दिशाहीनता और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित तुम्हारी जीवन शैली ने आज़दी शब्द को अर्थहीन बना दिया है। इसका का आदर करो, यह बहुत क़ीमती है, मेरे बेटे।
उसने आत्म-निर्भरता के साथ नपे-तुले शब्दों में एक ही वाक्य में उत्तर देते हुए मुझ से कहा- आप बूढ़े हो गए हैं पिताजी।
मैंने अपनी बेटी से कहा- समाज ने लड़कियों के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित की हुई हैं। तुम उन सीमाओं का उल्लंघन करती दिखाई दे रही हो। लज्जा हमेशा से स्त्री का बहुमूल्य आभूषण रहा है, तुमने यह आभूषण क्यों उतार फेंका मेरी प्यारी बेटी? उसने तुरंत भाहीन स्वर मैं मुझे उत्तर देते हुए कहा- आप बूढ़े हो गए हैं पापा।
मैंने अपनी पत्नी से कहा- नारी स्वतंत्रता, महिला सशक्तिकरण,आत्मसम्मान एवं पुरुष से समानता जैसे शब्दों के मायाजाल मैं फंसकर यह जो कुछ आप नि:संकोच एवं निर्भय होकर कर रही हैं,यह सरासर गलत है और आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही भी। हमारी सभ्यता, परंपरा और रीति-रिवाज किसी भी स्थिति में इसकी अनुमति नहीं देते हैं। भविष्य की पीढ़ियों के चरित्र निर्माण की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है। इस जिम्मेदारी को कुशलतापूर्वक पूरा कीजिए और तुरंत रोकिए इन खुराफात को, जो समाज में आ रहे बदलाव के नाम पर आप अपनाती जा रही हैं,नहीं तो देर हो जायेगी। अगर देर हो गई तो विरासत के नाम पर नई पीढ़ी को देने के लिए आपके पास कुछ नहीं बचेगा। इतना सुनकर उन्होंने बड़ी निंदनीय निगाहों से मुझे देखा और ललकारते हुए कहा- बूढ़े हो गए हैं आप।
परिवार की प्रतिक्रियाएं सुनने के बाद, मैंने समाज को संबोधित करते हुए कहा- ऐसी क्या मजबूरी थी जो रिश्तों की गरिमा,मान-मर्यादा, आपसी भाईचारा,सम्मान, प्रेम, व्यवहार,चरित्र की गरिमा, शालीनता सब कुछ छोड़ दी तुमने। तुम ही तो हमेशा से हमारी पहचान रहे हो। तुम ही बदल गए तो हम किस दर्पण में अपना प्रतिबिंब देखकर स्वयं को पहचानेंगे।
भावी पीढ़ियां किस चीज पर गर्व करेंगे।
क्या तुमने कभी सोचा है ? तो उसने बड़े अहंकारपूर्ण एवं उपेक्षिता के साथ मुझ से हुए कहा- बूढ़े हो गए हो तुम।
इसके बाद मैंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा- राष्ट्र स्वाभिमान, सम्मान,गौरव, रीति- रिवाज, सभ्यता आदि सब राष्ट्र इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों से लिखे यह वह शब्द होते हैं, जो सदियों में निर्माण होते हैं। त्यौहार प्र:या हमारी सभ्यता एवं परंपरा की पहचान रहे हैैं, तुमने इन सब मूल्यवान आदर्शों को छोड़कर यह किस नई सभ्यता के साथ हाथ मिला लिया है जो हमारी विचारधारा व चरित्र से मेल नहीं खाती है। हर रोज नए-नए त्यौहार,नई-नई मान्यताएं, जो तुम मनाने लगे हो वे हमारे समाज का कभी अंग नहीं रही हैं, यह विशेष दिवस मनाने का चलन तुमने कहां से सीख लिया। जो हमारी सभ्यता का हिस्सा कभी थे ही नहीं। इसकी जवाबदेही तो तुमको करनी ही होगी नहीं तो समय तुम्हें माफ नहीं करेगा।
उसने बड़ी घृणित नज़रों से मुझे देखते हुए कहा- बूढ़े हो गए हो तुम।
इस पूरे संवाद का निष्कर्ष यह निकला कि हर वर्ग ने एकमत होकर यह घोषणा करने में देर नहीं की कि मेरी सोच बूढ़ी एवं रूढ़िवादी हो चुकी है और मैं बुढ़ा। जबकि मैं यह मानने के लिए कदापि तैयाार नहीं कि मैं बूढ़ा हो गया हूं। मेरी चेतना मेरी सोच और मेरा विवेक मुझसे पूछता है। क्या क़ुराने पाक की शिक्षाएं,गीता के संदेश, बाइबल के उपदेश या गुरु ग्रंथ साहब की वाणी कभी बूढ़ी हो सकती है ? क्या पीर-फकीरों, ऋषि- मुनियों के पाक क़दमों से गुंथी मेरे देश की मिट्टी बूढ़ी हो सकती है ? क्या मेरे देश की बहुरंगी विरासत कभी बूढ़ी हो सकती है? अगर यह सब बूढ़े नहीं हो सकते हैं, तो मैं कैसे विश्वास कर लूं कि मैं बूढ़ा हो गया हूं।
- शाहिद हसन शाहिद
70093-16991
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