Thursday, April 15, 2021

बैगम

आप ज़िद छोड़ क्यों नहीं देतीं, मुझे चश्मा बनवा दीजिए। मेरी मजबूरी को समझिए,मैं चश्मे के बगैर देख नहीं पा रहा हूं, पढ़ नहीं पा रहा हूं, दिनचर्या मैं कठिनाइ हो रही है। लिखना पढ़ना,यार दोस्त सब छूट गए हैं। अपनी विकलांगता के कारण किसी को फोन तक नहीं कर पा रहा हूं। मैंने बैगन से एक मजबूर की तरह फरियाद करते हुए कहा। उत्तर में उन्होंने कहा- सब्र कीजिए, थोड़े ही समय की बात है। बेटा कनाडा गया है और मुझसे वायदा करके गया है कि वह अपनी पहली कमाई की मोटी रक़म सबसे पहले मुझे भेजेगा। पैसे मिलते ही मैं सबसे पहले आपके लिए सोने के फ्रेम का चश्मा बनवा दूंगीं।
तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप यह क्यों नहीं समझतीं, पिछले 6 माह से मैं सोने के फ्रेम वाले चश्मे के इंतज़ार में विकलांगों जैसा जीवन बिता रहा हूं। आखिर ऐसा कब तक चलेगा, इंतज़ार की भी कोई सीमा होती है। मेरा अपना भी कोई अस्तित्व है। इसके आगे मैं कुछ कह पाता बेगम ने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा- सब्र कीजिए सब्र। सब्र का फल मीठा होता है।
बेगम की नसीहत सुनकर मैंने चिढ़कर एक बार फिर कहा- आप हट छोड़ क्यों नहीं देतीं, मुझे सोने के फ्रेम वाले चश्मे से कहीं अधिक एक ऐसे चश्मे की आवश्यकता है, जो मेरी दिनचर्या में मेरी मदद कर सके। फिर बात को और आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा- मोटी कमाई जब आएगी तब आप उससे अपने लिए गहने बनवा लीजिएगा। वह गहने जो आपने अपने बेटे को कनाडा भेजते समय उसकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बेच दिए थे। मुझे सोने के फ्रेम वाले चश्मे की आवश्यकता नहीं है, मुझे तो आप साधारण सा चश्मा बनवा दीजिए। मेरा काम चल जाएगा।
मेरे तर्क सुनकर बेगम फिर बोलीं- गहनों से कहीं ज्यादा मुझे आपके चश्मे की चाहत है, वैसे भी मेरा गहना तो आप हैं। कनाडा गया  बेटा है। मैं तो केवल आपकी आंखों पर सोने के फ्रेम वाला चश्मा देखना चाहती हूं। यही मेरी तमन्ना है और यही मेरी इच्छा है। इतना कहकर बेगम ने मुझसे कहा- मेरा दिल घबरा रहा है, मुझे पसीना आ रहा है।आप एक गिलास पानी ला दिजिए। मैं उनके लिए जब पानी लेकर आया तो वह खामोश थीं। मैंने उनको पानी देना चाहा जो उन्होंने नहीं लिया। मैंने उनको आवाज़ दी। वह नहीं बोलीं, उनकी खामौशी बरक़रार रही। उनके इस प्रकार अचानक खामोश हो जाने से मैं परेशान हो गया। मैंने उनको फिर आवाज़ दी- बेगम- बेगम। वह नहीं बोलीं, फिर आवाज़ दी- बेगम- बेगम। वह नहीं बोलीं। मैंने उनसे कहा- आप बोलती क्यों नहीं हैं ?
वह फिर भी नहीं बोलीं।
अब मुझसे सब्र नहीं हुआ मैंने व्याकुल होकर उनको छू कर देखा, उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैंने नव्ज़ टटोली, जो नहीं चल रही थी। उनके दिल की धड़कन को सुना, वह भी खामोश थी। 
उनकी इस खामोशी के बाद मुझे पूरा यकीन हो गया कि वह मेरे चश्मा पाने की ज़िद को पूरा करने के लिए दूर बहुत दूर कनाडा या भगवान के पास चली गई हैं।
अचानक हुए इस हादसे के कारण मैं खुद को संभाल नहीं सका और पागलों की तरह अपनी क्षमता से कहीं अधिक ज़ोर ज़ोर से चीखते हुए रो-रो कर पुकाराने लगा- बेगम बेगम, आप ऐसा नहीं कर सकतीं। मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं, आप चली गयीं तो मुझे चश्मा कौन बनवाकर देगा। आप ही तो मेरी आंखें हैं। आप ही तो मेरा सहारा हैं। यह कहते हुए मैं गला फाड़कर चीख रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि मेरी आवाज़ यहां कोई नहीं सुनने वाला है जो सुन सकता था वह अच्छे भविष्य की तलाश में कनाडा बेठा है। मुझे अपनी आवाज़ बेटे तक इसी वक़्त पहुंचाना जरूरी थी ताकि मेरी आवाज़ सुनते ही वह मुझे सोने के फ्रेम का चश्मा तुरंत भेज दे और मैं अपनी बेगम का आखरी दीदार उस सोने के फ्रेम वाले चश्मे से कर सकूं जो उनकी आखरी तमन्ना थी।
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शाहिद हसन शाहिद
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Tuesday, March 30, 2021

मेरी संपत्ति

मेरा शरीर मेरी संपत्ति है। मैं इसको जिस प्रकार चाहूं रख सकती हूं। किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। यह शब्द उस लड़की के थे, जो देखने में एक मध्यवर्गीय परिवार की लग रही थी और मेरे पास नौकरी की तलाश में इंटरव्यू देने आई थी। पश्चिमी डिजाइन के कपड़ों में वह सुंदर लग रही थी। मैंने एक नज़र उस पर डाली और बैठने के लिए कुर्सी की ओर इशारा करके उसका सीवी पढ़ने लगा। शैक्षणिक योग्यता देखने के बाद जब मैंने कुछ प्रश्न पूछने के लिए उसकी ओर देखा, तो मैं यह देखकर हैरान रह गया की 21 वर्षीय इस लड़की की शर्ट में बटन नहीं थे और जो वह पहने थी उसका गला गहराई तक खुला हुआ था। जिस से उसके शरीर के खुले अंग साफ देखे जा सकते थे। जबकि वह इस दिगम्बर अवस्था में सजगता के साथ बैठी हुई थी।
मैंने अपनी नज़रें नीचीं रखते हुए उससे कहा- पहले आप अपने कपड़े ठीक कीजिए फिर आगे की बात करते हैं।
उसने बुरा सा मुंह बनाकर मेरी ओर देखा और पूछा- इसमें बुरा क्या है ? 
मैंने कहा- बुरा कुछ नहीं है फिर भी बेटियों का सम्मान हमारी संस्कृति है। इतना सुनकर उसने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा- शहर में लगे बड़े-बड़े होल्डिंग पर नज़र आने वाली मॉडल के कपड़ों पर आपने कभी आपत्ति नहीं जताई ? उनको देखकर क्यों शांत हो जाते हैं आप और आपका सभ्य समाज। उन बड़े ब्रांड से क्यों नहीं कहा जाता कि हम तुम्हारे प्रोडक्ट का बहिष्कार कर रहे हैं, तुमने एक स्त्री को भरे बाज़ार में निर्वस्त्र किया है। 
उसका तर्क सुनकर मैंने कहा- देखो बेटी...! वह रंगों से बनी केवल एक छवि होती है, मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही उसनेे मुझे रोकते हुए कहा- पर वह छवि होती तो एक स्त्री की ही है।
मैंने फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- उनमें भावनाएं नहीं होती हैं।
उसने फिर टोकते हुए कहा- परंतु वह भावनाएं जगाती तो है। 
जीवित औरत और तस्वीर में बहुत अंतर होता है, आप यह क्यों नहीं समझातीं। हाड- मास की महिला में भावनाएं भी होती हैं और सेक्स अपील भी। अक्सर देखा गया है कि महिला को अर्धनग्न देखकर बहुत से अमानुष्य अपने ऊपर निरंतर खो देते हैं और बलात्कार जैसे संगीन जुर्म हो जाते हैं। मैंने उसके तेवर देखते हुए समझाने की कोशिश की।
यह पुरुषों की समस्या है,उनकी बिमार मानसिता और परवरिश की समस्या है, स्त्री की नहीं। उसने भी तुरंत उत्तर देते हुए कहा। इतना कहकर वह कुछ क्षण के लिए खामोश हुई और एक गहरी सांस लेते हुए बोली- देखिए, अंकल...! पुरुष समाज को महिला के प्रति अपना दख्यानूसी दृष्टिकोण बदलना होगा विश्व गुरु ऐसे ही नहीं बना जाता इसके लिए समाज को एक बड़ी राष्ट्रवादी क्रांति सोच की आवश्यकता है जिसमें हम महिलाएं की हिस्सेदारी भी जरूरी है। 5 मीटर साड़ी में लिपटी महिला अब अपने हौसलों के साथ खुले आसमान में उड़ना चाहती है, जो उसका हक़ है उसको उसका हक़ मिलना चाहिए। फिर उसने मुझसे कहा-
पुरुष प्रधान समाज ने अपनी झूठी शान बनाए रखने के लिए महिला को बड़ी चतुराई से अपने शाब्दिक जादू से लज्जा व शर्म जैसे मायावी ज़ेवर पहना कर युगों से क़ेद कर रखा है। उसकी शारीरिक संपत्ति को कपड़ों से बनी गुफाओं में कैद रखने का एक प्रकार से अपराध किया है। इतना कहकर वह खड़ी हो गई, मैं समझा कि मेरे विचारों से वह नाराज़ हो गई है और अब मेरी झूठी सभ्यता पर थूक कर जा रही है। मैंने इस क्रांतिकारी लड़की को सर से पैर तक गौर से देखा। उसने भी मुझे देखते हुए देख लिया था। शायद इसलिए वह गई नहीं बल्कि बड़े आराम से कुर्सी पर बैठ गई और बोली- अंकल...! सच बताएं
आपने मुझमें क्या देखा।
मैंने कहा- कुछ खास नहीं देखा, केवल यह कि तुम एक आम सी दिखने वाली लड़की हो, जिसकी जींस घुटनों से ऊपर और घुटनों से नीचे फटी हुई है।
उसने कहा- इसके अतिरिक्त आपने क्या देखा ?
मैंने कहा- इससे ज्यादा कुछ नहीं देखा।
उसने कहा- यही बात मैं कहना चाहती हूं कि पुरूषों को महिलाओं को देखने का आपना दृष्टि कोण बदलना होगा। आपको मेरी फटी जींस के अतिरिक्त कुछ नज़र नहीं आया क्योंकि आप कुछ और देखना नहीं चाहते थे, जबकि कुछ लोग अपनी लालसा में बहुत कुछ तलाश करते हैं। उन लोगों को फटी जींस देखने की आदत डालनी होगी इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। फटे जींस जो आज का फेशन हैं। 
फिर उसने आगे कहना शुरू किया कि कुदरत ने किसी चीज़ को छुपा कर नहीं रखा है। हमने कपड़ों को डिजाइन करते समय मर्द और औरत में भेदभाव पैदा किया है। इस भेद भाव को समाप्त करना समय की आवश्यकता है।औरत की आजादी और सशक्तिकरण बहुत जरूरी है। देश के विकास में बाधा आ रही है। हम अपने देश को महिलाओं की आजादी के परिपेक्ष में जापान,फ्रांस,चाइना,इसराइल और अमेरिका की तुलना में बहुत पिछड़ा पाते हैं।
उसकी आक्रामकता को देखते हुए मेरी यह पूछने की हिम्मत ही नहीं हूई कि क्या वह उन महिलाओं की बात कर रही है, जो आजादी और पुरूष समानता के नाम पर आंदोलन करते समय पूरी तरह नंगी होकर सड़कों पर फोटो शूट कराती हैं। क्योंकि मैं विवाद नहीं चाहता था। फिर भी मैंने डरते डरते उससे पूछा- तुमको इस प्रकार रहने पर डर नहीं लगता ? 
उसने पुनः मुझसे पूछा- कैसा डर ? फिर उसने कहा- डर नाम की कोई चीज संसार में नहीं होती है, जहां विश्वास कमजोर पड़ जाता है वहां डर आ जाता है और लोग उसको धर्म कहने लगते हैं। इतना कहकर वह मुस्कुराई और बोली- आपके छुपे हुए प्रश्न का उत्तर यह है कि चोरियां तो बंद कमरों में भी हो जाती हैं। हमें चोरी से नहीं चोरों से लड़ना है। उसके तर्क और क्रान्तिकारी जज़्बात सुनकर मैं कुछ कहने की हालत में स्वयं को नहीं पा रहा था।
केवल इतना ही सोच रहा था कि वह कौन लोग हैं जो इन लड़कियों को अपने स्वार्थ के लिए दिशाहीन कर रहे हैं ? बेरोजगारी इसका मूल कारण तो नहीं है ? या नफरत का यह एक ऐसा सोचा समझा खेल है, जो राजनीतिक इशारों पर महिलाओं के हक़ के नाम पर खेला जा रहा है। बाजारवाद या महिला वोट बैंक को बढ़ावा देना जिसका मुख्य उद्देश्य है। एक विचार मेरे मन में यह भी आ रहा था कि अपने आदर्श,मान मर्यादा, उच्च धार्मिक विचार और संस्कारों की आध्यात्मिक खुशबू से पूरे संसार को सुगंधित करने वाला पिता आज अपनी ही मासूम बच्चियों का दुरुपयोग होता देख कर खामोश क्यों है ? गफलत में कूड़ेदान पर फेंकी गई वस्तु को दुबारा उठाने में संकोच केसा ?
सवाल गम्भीर हैं समाधान तलाश करना होगा। आप भी सोचिए मैं भी सोचता हूं।
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शाहिद हसन शाहिद
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Monday, March 15, 2021

पाठशाला

"आपने मुझे पाल-पोस कर कोई एहसान नहीं किया है, अपनी अय्याशी की क़ीमत चुकाई है।"
बेटे के मुंह से यह अनजान अल्फाज़ सुनते ही मैं हेरान रह गया क्योंकि यह भाषा ना तो मेरे परिवार की है और ना ही मेरे संस्कार ऐसे हैं। शब्द "अय्याशी" सुनकर मैं एक ऐसे शुन्य में परिवर्तित होता चला गया जिसके आगे और पीछे कोई संख्या ना हो। सिर्फ सवालों का ख़त्म ना होने वाला सिलसिला हो जो मुझे आंखें बंद करके सोचने पर मजबूर कर रहा हो कि मैं अपने अतीत के काले सायों को तलब करुं और उनसे पुछूं- ऐ काले सायों तुम गवाही दो कि अतीत में कभी ऐसा हुआ है कि मैंने गुस्से से पागल होकर अपने पूज्य पिता या परिवार के किसी सदस्य को  अपशब्द कहने का साहस किया हो ?        तो काले साए अपने हाथ खड़े करते हुए कहें- नहीं, कभी नहीं۔۔۔۔! हमने इस प्रकार पिता या परिवार वालों की तौहीन करते आपको कभी नहीं देखा। 
काले सायों की गवाही के बाद भी प्रश्न फिर भी वहीं खड़ा था कि मेरे बच्चे के मुंह में अय्याशी जैसा अपशब्द किसने डाला ? किस पाठशाला ने उसको यह शब्द सिखाया, और कौन है गुरु उसका ?
इन सवालों में उलझा ही था तभी मुझे याद आया कि मेरा बच्चा कल अपनी मां को समझा रहा था कि पेट्रोल और डिजल के दाम बढ़ने से देश का गौरव बढ़ा है यह राष्ट्रीय हित में है। तब मेरी समझ में आया कि उसका गुरु कोई और नहीं बल्कि वह स्मार्ट फोन है, जो मैंने ही उसको जन्मदिन पर उपहार में दिया था। 
स्मार्टफोन उसके हाथ में देते ही, मैं उसमें बहुत से बदलाव महसूस कर रहा हूं । मेरा शर्मिला बच्चा जो कल तक अपनी पेंट की खुली ज़िप की परवाह नहीं करता था, वह आज अपने फोन के लिए हर समय सतर्क रहता है। अगर किसी कारण फ़ोन का लाक खुला रह जाए या फोन इधर-उधर रखा जाए तो वह बेचैन ही नहीं होता बल्कि पागल हो जाता है। उसकी घबराहट और बैचेनी यह कहती है कि उसकी इस ज़रा सी चूक या लापरवाही के कारण मोबाइल में रखा हुआ उसका काला धन सार्वजनिक हो जायेगा और सरकार की नज़र पड़ते ही वह किसी बड़ी मुसिबत का शिकार हो जाएगा।    बच्चा अब बड़ी-बड़ी बातें भी करने लगा है। पहले से अधिक स्मार्ट और रहस्यमय भी हो गया है। उसकी रहस्यमय स्मार्टनेस देखकर ही मुझे अब अपनी गलती का एहसास हो रहा है कि मैंने बचपन की दहलीज़ पर खड़े अपने मासूम बच्चे के हाथ में समय से पहले स्मार्टफोन देकर अनजाने में उसकी ऊंगली समाज के उन लोगों को पकड़ा दी है, जो कभी उसकी पहुंच में नहीं थे, परंतु अब वे ही लोग फोन के माध्यम से उससे खेल ही नहीं रहे हैं बल्कि उन्होंने उसको सेल्फी वाले फोन से सेल्फी लेने का हुनर और रज़ाई में मुंह छुपा कर सपने देखना, खरीदना और बेचना भी बहुत कम समय में सीखा दिया है। इस हुनर ने ही उसको एक ऐसे बाज़ार का खिलाड़ी बना दिया है, जहां उसके नाम को लोग लाइक तो करते हैं पर नज़र नहीं आते। 
फोन ने उसको अपने एवं दूसरे धर्मों की वह गोपनीय बातें भी बता दी हैं जो उसके पूर्वजों ने परंपरा व समाज में सद्भाव बनाए रखने के लिए ना जाने कितने युगों से छुपा कर रखी थीं, जबकि वह जानते थे एक दिन जब बच्चे जवान होंगे तो यह जटिलताएं वह स्वयं ही जान जाएंगे। 
इतिहास का ज्ञानी भी वह हो गया है। परिवार को यह बताने का होंसला भी उसमें आ गया है कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, मुसलमान और ईसाईयों को इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। यह लोग देश पर एक ऐसा बोझ हैं, जो बहुसंख्यक हिंदुस्तानियों पर उनकी इच्छा के विपरीत इस प्रकार लाध दिए गया है जिस प्रकार धोबी अपने गधे पर हर धर्म के कपड़े उसकी इच्छा के विरुद्ध लाध देता है।
सोशल मीडिया, जिसको वह पूज्य पाठशाला की तरह आदर करता है, उसको यह पाठ पढ़ाने में भी सफल हो गई है कि उसके देश को सेकुलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता के कैंसर ने बर्बाद किया है। वह यह भी जानता है कि यह वायरस पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने स्वार्थ के लिए पैदा किया था। किसी अवसर पर मेरे पूछने पर उसने कहा था कि जवाहर लाल नेहरू कौन थे, यह वह नहीं जानता है और ना ही जानना चाहता है, परंतु वह किसके इश्क में मुब्तिला थे और उनकी नूरजहां कौन थी यह सच्चाई वह अच्छी तरह जानता है। 
महात्मा गांधी के चरित्र और उनकी लीलाओं की सच्चाई के बारे में भी उसको सब कुछ पता है। इस लिए अब उसने अपना आइडियल बदल लिया है।
आज़ादी से पूर्व और बाद में देश को धोखा देने वाले देशद्रोही और राष्ट्रप्रेमी कौन लोग हैं, यह सच्चाई भी वह भली-भांति जान चुका है। 
राष्ट्रवाद के शिकार मेरे बेटे ने परिवार और समाज से दूरी बनाना बना ली है उसे अब हर व्यक्ति राष्ट्रद्रोही नज़र आ रहा है। उसने मुझसे भी बात करना कम कर दिया है या तो वह मुझे राष्ट्रद्रोही समझने लगा है या अपने से कम ज्ञानी या फिर एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी अय्याश के कारण बच्चों की फोज खड़ी कर दी है। 
अंततः मैं यह कहने के लिए विवश हूं कि स्मार्टफोन ने मेरे बेटे से उसकी बचपन की मासूमियत छीन ली है। लोगों का कहना है कि संसार सिमटकर एक गांव कि तरह हो गया है, जबकि मेरा बेटा परिवार और समाज से कटकर एक नए संसार में खो गया है, जो उसकी पैंट की बैक पाकिट में बस्ती है। यह पाकिट ही अब उसका परिवार, समाज, देश, धर्म, पाठशाला और समस्त संसार होकर रह गई है। इसी पाकिट के संसार ने उसको सिखाया है कि तुम्हारे पिता ने तुम्हारा लालन-पालन करके तुम्हारे ऊपर कोई उपकार नहीं किया है बल्कि अपनी अय्याशी की कीमत चुकाई है।
स्मार्टफोन ने मेरा जवान बेटा चुरा लिया है। मैं बेटे को खोकर अपनी भूल की भारी क़ीमत चुका रहा हूं, शायद मेरी तरह ही देश के सारे पिता अपने बच्चों के चोरी होने की कीमत चुपचाप चुका रहे हैं।
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शाहिद हसन शाहिद
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Sunday, February 28, 2021

आतंकी कौवे

वह एक ऐसा साधु है जो शनी और मंगल के प्रकोप से मुझे बचाने और मेरी हर मनोकामना पूरी करने के उद्देश्य से सप्ताह में कई बार मुझसे सरसों का तेल, काली दाल ले जाता है। इसके अतिरिक्त भी वह नित्य नए बहानों से मोटी रक़में मेरी जेब से निकालने का मास्टर है। अपनी इस अनोखी कला के कारण ही कभी कभी वह मुझे वित्त मंत्री लगने लगता है, रक़म ठगते समय वह राष्ट्रीय हित का सहारा लेकर मुझे भावुक बनाने में सफल हो जाता है और मैं हर बार उसके हाथों मुर्ख बन जाता हूं। एक आम आदमी जो मैं ठहरा। झोला छाप वह एक ऐसा साधु है जो मुझे यह विश्वास दिलाने में सफल है कि मेरा दिया हुआ दान मेरे विकास और मेरी जान माल की हिफाजत की फुल फलेज गारंटी है और साधु स्वयं मेरी हर इच्छा पूरा करने के लिए वचनबद्ध है। दान की इस शक्ति को समझते हुए मैं साधु महाराज का एक प्रकार से अंध भगत बन चुका हूं जो स्वयं को बड़ा भाग्यशाली और गोरवान्वित महसूस करता है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने साधु पर विश्वास के रूप में एसबीआई में एक बड़ी रकम फिक्स डिपॉजिट कर रखी हो, जिसको मैं जब चाहूं, जहां चाहूं, जितना चाहूं कैश करा सकता हूं।
एक दिन मैंने साधु की वचनबद्धता को परखने के तौर पर उससे कहा- महाराज मेरे मन की इच्छा तो यह है कि मैं देश का प्रधानमंत्री बनूं परंतु देश की परिस्थितियों को देखते हुए अब मैं यह चाहता हूं कि आप मुझे केवल "निठल्ला" बनने का वरदान दें।
मेरी अजीब सी इच्छा सुनने के बाद साधु ने कहा "निठल्ला" तो मैं तुमको बना दुंगा परन्तु पहले तुम्हें राष्ट्र हित में एक काम करना होगा। मैंने पूछा वह क्या है ? 
साधु ने तुरन्त कहा- खुले आकाश में उड़ने वाले उन काले कौवों को भगाना होगा जिनकी कांव-कांव ने देश के शांतिपूर्ण माहौल को दूषित कर रखा है।
साधु के इस सुझाव को मैं समझ नहीं सका कि वह ऐसा क्यों कह रहा है कि मैं निठल्ला बनने से पहले कौवे उड़ाऊं। साधु ने तो मुझे विश्वास दिलाया था कि वह मेरी हर मनोकामना पूरी करने की शक्ति रखता है, सो मैंने निठल्ला बनने की अपनी इच्छा कह दी तो यह कंडिशन एप्लाई शर्तें कहां से आ गयीं ? 
स्वाभाविक तो यह था कि साधु मुझसे पूछता कि अचानक तुमने प्रधानमंत्री बनने की अपनी चाहत से मुंह क्यों मोड़ लिया?
"निठल्ला" बनने का विचार तुम्हारे मन में कहां से आ गया?
यह शब्द तुमने कहां से सिखा? 
जिसके उत्तर में, मैं उसको बताता कि यह शब्द मैंने किसान आंदोलन से सिखा है और वहीं से मैंने यह भी जाना है कि आजकल देश निठल्लों को काफी इज़्ज़त की निगाह से देख रहा है। निठल्लों का ग्राफ शेयर मार्केट की तरह उछालें मार रहा है। इसी गर्व को ग्रहण करने की ख्वाहिशों ने मुझे यह साहसी फेसला लिने पर मजबूर किया है। परंतु जुमले बाज़ साधु ने मेरी हसरत पर पानी फेरते हुए बड़ी चतुराई से मुझे असल मुद्दे से भटका कर मेरा सामना काले कौवों से करा दिया जिनको वह आतंकवादी समझता है। 
अब मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि साधु के बताए आतंकियों को कहां तलाश करूं। साधु किन आतंकियों की बात कर रहा है। 
कहीं उसका इशारा उन कौवों की ओर तो नहीं है जो गत चार पांच वर्ष में देश के कौने कौने में कभी किसान आंदोलन जीवी बनकर,कभी आतंकवादी जीवी, कभी नक्सलवादी जीवी, कभी अर्बन नक्सलवादी जीवी, कभी टुकड़े टुकड़े गेंग जीवी,कभी मजदूर जीवी,कभी व्यापारी जीवी,कभी निम्न व मध्य वर्गीय जीवी,कभी शिक्षक जीवी, कभी सहायक शिक्षक जीवी, कभी पाकिस्तानी जीवी, कभी चाइनीज़ जीवी, कभी लव जिहाद जीवी, कभी तीन तलाक़ जीवी, कभी सीए विरोधी जीवी, कभी एन आर सी विरोधी जीवी, कभी जयश्री राम विरोधी जीवी, कभी डॉक्टर जीवी, कभी नर्स जीवी, कभी प्रोफेसर जीवी, कभी विद्यार्थी जीवी, कभी आंगन वाड़ी वर्कर जीवी और ना जाने किस किस रूप के आंदोलन जीवी कौवे बनकर देश के आकाश में कांव कांव करते सुनाई दे रहे हैं। इन कौवों तक पहुंचते ही मेरी हालत अब कुछ इस प्रकार हो गई है कि जब मैं सोता हूं तो मुझे सपने में कौवे नज़र आते हैं। जागता हूं तो मुझे हर व्यक्ति कौवा जैसा दिखाई देता है और मैं उसके चेहरे पर कौवे की नुकेली चोंच देखकर नफरत से मुंह मोड़ लेता हूं। निगाहें हर समय आसमान और ज़मीन पर नए नए कौवे तलाश करती रहती हैं। विपक्ष का तो हर नेता मुझे कौवा ही नज़र आता है। 
कौवों के इन माया जाल से जितना खुद को आज़ाद कराना चाहता हूं उतना ही उसमें फंसता जा रहा हूं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अपनी इस हालत के लिए किसको जिम्मेदार ठहराऊं.....?
खुद को.....?
अपनी इच्छा को.....?
साधु को.....?
या कौवों को.....?
राष्ट्रहित में किसी को तो यह जिम्मेदारी लेनी ही होगी। 
मुजरिम कोई तो है इन परिस्थितियों का। 
ऐसा मुजरिम जिसको माफ नहीं किया जा सकता। 
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Monday, February 15, 2021

अफवाह जीवी

काला कुर्ता,गले में भगवा गमछा और माथे पर लाल तिलक लगाए जब वह सड़क पर इतराते हुए निकलता तो देखने वाले दंग रह जाते। लोगों को महसूस होता कि सड़क पर कोई आंदोलनन जीवी नहीं बल्कि पूरा आंदोलन दौड़ा चला आ रहा है।
जीव जैसा दिखने वाला यह व्यक्ति था बहुत ही चुस्त व चालाक। हाथ नचा-नचा कर बात करने और जुमले वाज़ी का वह ऐसा हुनर जानता था कि अच्छे-अच्छे मदारी उसके सामने पानी भरते नज़र आते। उसके चाहने वालों का एक बड़ा ग्रुप था जो उसको पप्पू कह कर बुलाता था, जिसका वह कभी बुरा नहीं मानता था। 
पप्पू ने "अफवाह जीवी" नाम का एक क्लब बना रखा था। यह अपनी तरह का ऐसा क्ल्ब था जो नए और पुराने चुटकुलों को नए अर्थ और नए जुमलों से सजाकर मनोरंजित बाजार में उतार कर लोगों को मुस्कुराने के लिए मजबूर करता था।
इस अनोखी पैदावारी यूनिट का पप्पू ऐसा चेयरमैन था जो लोगों की फरमाइश पर अपनी फेक्ट्री का तैयार चुटकुला उसी समय सुनाकर आगे बढ़ जाता। यही उसकी दिनचर्या थी। आज भी उसने लोगों की फरमाइश पर एक चुटकुला सुनाया जो कुछ इस प्रकार था....
एक बुद्धिजीवी बहुत बड़ा पत्नी प्रेमी था जो हर समय पत्नी की सेवा में लगा रहता और उसको मेरी सरकार, मेरी सरकार कहकर खुश रखने की कोशिश करता रहता था। जबकि पत्नी उसको आम जनता की तरह बुध्दूजीवी से अधिक भाव नहीं देती थी। पत्नी का चरित्र बड़ा विवादित था। वह अपने बुध्दू पति से अधिक अपने घनिष्ठ मित्रों को तवज्जो देती थी। लोगों की निगाह में वह एक दिशाहीन पत्नी थी,जो अपने कुछ मित्रों के साथ बने संबंधों को लेकर काफी बदनाम थी। पत्नी के तर्क अनुसार यह उसकी नवीनतम जीवन शैली का एक ऐसा पक्ष था जिस पर किसी को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। 
पत्नी के इस रवैये और लोगों के तानों से वह व्यक्ति काफी दुखी और डिप्रेश रहता था। उसने अपनी पत्नी को बार-बार समझाया कि तुमने अपने लिए जो रास्ता चुना है वे ठीक नहीं है। दूसरे पुरुषों से इस प्रकार खुलेआम संबंधों रखना हमारा पारंपरिक समाज स्वीकार नहीं करता है। कुछ पर्दा रहना चाहिए। खुलेपन की इस अंधी दौड़ से तुुम बाहर आओ और अपनी इस खराब आदत को छोड़ कर एक संस्कारी पत्नी की तरह मेरे दिल की सरकार और मेरा स्वाभिमान बनकर रहो।
दिशाहीन पत्नी पर इन बातों का कोई असर नहीं था और वह अपनी हरकतें छोड़ने को तैयार नहीं थी। उस व्यक्ति के घनिष्ठ मित्र उसकी इस परिवारिक समस्या को जानते थे परन्तु वे इस संबंध में उसकी कोई सहायता नहीं कर पाते क्योंकि वे जानते थे कि यह उसका आंतरिक घरेलू मामला है।
एक दिन अचानक वह व्यक्ती खुश-खुश अपने मित्रों के पास पहुंचा। 
मित्रों ने जब उसका खुशी से हो रहा लाल चेहरा देखा तो वे समझ गए कि कोई अच्छी खबर है, जो वह उनको सुनाने वाला है।
मित्रों ने उत्सुकता दिखाते हुए उससे कई सवाल एक साथ पूछ डाले- उन्होंने पूछा- क्या भाभी ने तुम्हारी नसिहत मान ली है, क्या उन्होंने अपने चरित्र को ठीक करने का निर्णय ले लिया है, क्या उन्होंने अपने आवारा मित्रों को छोड़कर तुम्हारे साथ एक वफादार पत्नी की तरह रहना स्वीकार कर लिया है?
मित्रों के सवाल सुनकर उस व्यक्ति ने एक गहरी सांस ली और कहा-ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सब कुछ पहले जैसा ही है वह अपनी ज़िद पर अभी भी कायम है।
मित्रों ने पूछा तो फिर तुम्हारी खुशी का राज़ क्या है?
उसने गंभीर होते हुए कहा-मैंने खुश रहने का आसान रास्ता तलाश कर लिया है।
मित्रों ने पूछा- वह रास्ता क्या है? 
उसने कहा- मैंने अपनी सोच बदल ली है।
मित्रों ने कहा- हम समझे नहीं?
उसने कहा-मेरी बदली हुई सोच अब यह कहती है कि मेरी पत्नी जिसको मैं प्यार से "सरकार" कहता हूं वह समाजिक तौर पर धर्म पत्नी तो मेरी है परंतु फील गुड उससे आजतक उसके धनवान मित्र लेते रहे हैं। अब मेरी नई सोच के अनुसार आज से मैं यह सोचूंगा कि वह पत्नी तो उन धनवान लोगों की ही है परंतु जब भी मुझे अवसर मिलेगा मैं "फील गुड" का मज़ा उठाउंगा। 
इतना कहकर पप्पू आगे बढ़ गया। लोग हंसते रहे किसी ने यह नहीं सोचा कि पप्पू ने जवाहर लाल नेहरू के ज़माने के पुराने चुटकुले को किस सुन्दरता के साथ अपनी जुमले बाज़ी की महारत से आज का सच बना दिया था।
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Saturday, January 30, 2021

मासूम पोती


टेलीविजन पर पूरे दिन बलात्कार की खबरें और उनपर पर होने वाली डिबेट सुनते सुनते जब मैं थक गया,तो खुद को तरोताज़ा करने के लिए आंखें बंद करके आराम से सोफे पर पैर फैला कर बैठ कर सोचने लगा कि बाज़ार वाद के बढ़ते प्रभाव और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप ने हमको यह किस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है कि कल तक जिस कन्या को हम देवी की तरह पूजा करते थे, जिस को हम घर की लक्ष्मी कहते थे,जो महिला परिवार की इज़्ज़त व आबरू हुआ करती थी, जिसके कदमों के नीचे बच्चे अपनी जन्नत तलाश करते थे,आज उसी देवी को लोगों ने अपनी हवस की पूर्ती की वस्तु विशेष और प्रयोग करके फेंकने वाला नेपकिन बना दिया है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हमारा नेशनल मीडिया बलात्कार से संबंधी समाचार देश के कोने-कोने से ढूंढ ढूंढ कर क्यों लाता है? फिर उस समाचार को डिबेट के माध्यम से चटकारेदार बनाकर उसमें धार्मिक,राजनीतिक एवं विपक्ष को घेरने के पहलू तलाश करने या किसी एक जाति विशेष के साथ जोड़ कर नेशनल लेवल पर इस प्रकार परोसता है, जैसे यह कोई क्राइम ना होकर देश के विरुद्ध सोचा समझा रचा गया षड्यंत्र हो। नेशनल टीवी द्वारा इस गैर जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के बारे अभी मैं विचार कर ही रहा था कि मेरी पोती जो 6 वर्ष की है मेरे पास आई और मुझे झंझोड़ते हुए कहने लगी- दादू आप सो रहे हैं? मैंने अपनी आंखें खोलते हुए कहा-
 बेटा मैं तो जग रहा हूं। उसने कहा- मुझे आपसे कुछ पूछना है।मैंने उसको प्यार से गोद में बैठाते हुए बड़े स्नेह भरे अंदाज में पूछा- मेरे बेटे को दादू से क्या पूछना है पूछो।उसने बड़ी मासूमियत से शिकायती अंदाज में कहा- दादू...! मुझे कोई नहीं बता रहा है कि "बलात्कार" क्या होता है।मैं समझ गया कि निरंतर चलने वाले टीवी समाचारों में यह शब्द वह बार-बार सुन रही है,जबकि उसको अभी पूरी तरह भाषा का ज्ञान नहीं है, इस कारण उसकी भाषा सीखने की जिज्ञासा जाग गई है और वह बलात्कार शब्द का अर्थ समझना चाहती है परंतुु मेरे सामने उसका यह प्रश्न एक नाग की तरह फन फैलाए खड़ा था कि मैं इस मासूम को किन शब्दों में बताऊं कि बलात्कार क्या होता है।मैंने उसकी आयु और भोलेपन को देखते हुए उसको यह बताना ही उचित समझा कि मैं उस से यह कहूं कि बेटा यह एक प्रकार का बुखार होता है जो केवल महिलाओं को दुखी करता है। यह कहकर मैंने बच्ची को तो बहला दिया; परन्तु मैं अंदर से डर गया। मुझे डर इस बात का था कि भविष्य में जब कभी इसको बुखार आ गया तो यह पूरे मोहल्ले में शोर मचा देगी कि मेरा बलात्कार हो गया है। अभी मैं अपने इस अनजाने डर से उभर भी नहीं पाया था कि उसने एक और प्रश्न मुझसे पूछ लिया। दादू...! बलात्कारी कौन होता है?पहला गलत उत्तर देकर मैं बुरी तरह फंस चुका था, इसलिए मैंने दूसरा झूठ बोला और कहा- जिस मच्छर के काटने से बुखार आता है उसको बलात्कारी कहा जाता है।अब मैं समझ चुका था कि देश के दूरदराज़ गांव में किसी बच्ची के साथ हुए बलात्कार और बर्बर हत्या पर पूरे दिन चलने वाली मीडिया ट्रायल को सुनकर उसका मासूम ज़हन बहुत से प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए बेचैन है। मेरे उत्तर से पोती संतुष्ट नहीं थी। उसने तर्क देते हुए मुझे से फिर पूछा- दादू मम्मा तो जब मच्छर मारने की क्रीम हमको लगाती है तो कहती है कि इसके लगाने से मच्छर मर जाते हैं। मैंने टीवी में अभी-अभी देखा है कि लोग चीख चीख कर कह रहे थे कि बलात्कारी को फांसी दो।दादू...! मच्छर तो क्रीम लगाने से मर जाता है, तो उसको फांसी क्यों दी जाए? पोती के श्रंखला वद सवालों में से इस सवाल का मैं कोई उत्तर नहीं दे सका। बल्कि एक झटके के साथ सोफे से खड़ा हो गया और चीख़ते हुए परिवार वालों से कहा- सब लोग कान खोल कर सुन लो,आज के बाद कोई व्यक्ति टीवी पर बलात्कार से संबंधी समाचार या डिबेट नहीं सुनेगा। भारत पूछता है तो पूछता रहे, हर सवाल का जवाब देना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। यह कहते हुए मैंने घरवालों पर समाचार ना सुनने का फरमान जारी करते हुए उन पर ख़बरें ना सुनने का प्रतिबंध लगा दिया। यथार्थ का शायद यही सच है। इससे अधिक मैं या आप कुछ नहीं कर सकते। टीवी द्वारा खेले जा रहे टीआरपी के खेल के सामने हम और आप सब बोने जो साबित हो रहे हैं।  *****
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शाहिद हसन शाहिद
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Wednesday, January 20, 2021

कहानी मछली की

सोशल मीडिया से होती हुई एक सूचना जैसे ही समाचार पत्रों की सुर्खियों तक पहुंची कि एक मछली के पेट पर पीले रंग से लिखा शब्द "अल्लाह" साफ तौर पर पढ़ा जा सकता है, तो लोगों की सोई हुई आस्था एकदम जाग उठी और लोग दूर-दूर से इस अनोखी मछली को देखने के लिए उस जगह पहुंचने लगे जहां यह अद्भुत मछली अपनी भरपूर शानो शौकत के साथ एक छद्म तालाब जिसको इकोरियम कहा जाता है उस में तैर रही थी।

मैं जब वहां पहुंचा तो इकोरियम के आसपास लोगों की काफी भीड़ जमा थी, जो मछली को बड़े आदर और सम्मान के साथ देख रही थी। उनमें से कुछ श्रद्धालु आंखें बंद करके दिल ही दिल में उस मछली का आशीर्वाद प्राप्त करने और अपनी मनोकामना पूरी करने की अरदास कर रहे थे। कुछ शांत स्वभाव के साथ उसके दर्शन करके स्वयं को भाग्यशाली समझ रहे थे। वहां मोजूद कुछ धनवान ऐसे भी थे जो इस अद्भुत चमत्कार की बोली लगाकर उसको खरीदना चाहते थे, वे जानते थे कि मछली एक मध्यवर्गीय परिवार की संपत्ति है जिसको वह कुछ रुपए खर्च करके आसानी से खरीद कर अपने ड्राइंग रूम की शोभा और समाज में अपना गौरव बढ़ा सकते हैं। जो लोग इस मछली को खरीदने की क्षमता नहीं रखते थे वह दूर खड़े होकर कह रहे थे कि हमारे तो दिल में "अल्लाह" बसता है, हम तो क़ुदरत के इस करिश्मे को देखने आए हैं। कुछ ऐसे भी थे जो इकोरियम के शीशे पर इत्र (खुशबू) लगाने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ लोग दूर खड़े होकर धूप अगरबत्ती जलाकर रूहानी वातावरण बना कर अपनी श्रद्घा पेश कर रहे थे। धार्मिक विद्वान भी वहां मौजूद थे जो लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि हमें क़ुदरत के इशारे पर गौर करना चाहिए जो हमको याद दिला रहा है कि दुनिया की हर चीज़ का मालिको मुख्तार अल्लाह है। जबकि कुछ ऐसे भी थे जिनका कहना था यहां जो कुछ भी हो रहा है यह सब पाखंड है जिसको दूसरे शब्दों में बिद'त कहा जाता है।अल्लाह हम सबको इस गुनाहे अज़ीम से महफूज रखे। (इस्लाम जिन चीजों की इजाज़त नहीं देता है वे बिद'त कहलाती हैं।)

इन सब से अलग मैं यह सोच रहा था कि मछली के पेट पर नज़र आने वाला लफ्ज़ "अल्लाह" जीव रसायन की एक प्रक्रिया है, जो कभी भी डिलीट हो सकती है; परंतु जो डिलीट नहीं हो सकता है वह हमेशा रहने वाला नाम "अल्लाह" है जि‌को हम अपने ज़हन की किसी डिस्क में सेव करके भूल चुके हैं। विचारों के इस भंवर में डुबकी लगाते हुए मैंने देखा कि कुछ पत्रकार अपने कैमरों से उस नींबू मिर्ची के टोटके को कवर कर रहे हैं, जो कुछ समय पहले तक वहां नहीं था; परंतु अब वह उस ड्राइंग रूम के द्वार पर एक पहरेदार की तरह लटक रहा था जहां वह अद्भुत मछली लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनी हुई थी। तभी मेरा ध्यान उस महिला पत्रकार पर गया जो लाइव रिपोर्टिंग करते हुए अपने दर्शकों को बता रही थी कि इस अनोखी जलपरी ने लोगों में आस्था कि वह ज्योत जगा दी है जो इससे पहले अतीत में राम मंदिर अभियान के समय देखी गई थी। लोग इस जलपरी को भगवान का अवतार मान रहे हैं। उन्होंने उसकी विधिवत तौर पर पूजा-अर्चना भी शुरू कर दी है। जलपरी को कोई हानि न पहुंचे इसके भी पुख्ता प्रबंध कर लिए गए हैं, जहां यह जलपरी विराजमान है वहां नींबू मिर्ची लटका दिया गया है और लोगों से कहा जा रहा है कि वह जलपरी के आसन से दूरी बनाकर रखें।उसको छूने या किसी प्रकार की हानि पहुंचाने की कोशिश ना करें। जलपरी देश की धरोहर है। इसने भारत में प्रकट होकर पड़ोसी देश को जता दिया है कि अब उनका एकमात्र सहारा "अल्लाह" भी उनके साथ नहीं है। अंगारों की शैय्या पर लौटने वाला पड़ोसी देश इस देव्या चमत्कार से बुरी तरह बौखला गया है। वह इस सच्चाई को पचा नहीं पा रहा है कि "अल्लाह" ने उसका साथ छोड़ कर उस देश को क्यों चुना है जहां कण-कण में राम बसते हैं। अपनी जनता का ध्यान अपनी नाकामियों पर से हटाने के लिए वह कोई भी नापाक हरकत कभी भी कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो हम उस को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं। हम उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। उसको याद रखना होगा कि 130 करोड़ भारतीयों के साथ अब उस जलपरी की भी अपार शक्ति हमको प्राप्त है जिस पर खुद भगवान ने अपने हस्ताक्षर करे हैं।

लाइव टेलीकास्ट होने वाली इस रिपोर्ट ने मुझे व्याकुल कर दिया और उत्तेजित भी। मैं समझ नहीं सका कि यह किस प्रकार कि रिपोर्टिंग हो रही है तभी मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा और मैंने उस रिपोर्टर को इशारे से एक ओर बुलाकर कहा- यह क्या कर रही हो? उसने कहा- अपनी जॉब कर रही हूं कोई आपत्ति है।
मैंने कहा- हां...! आपत्ति है, एक जिम्मेदार वरिष्ठ नागरिक और पत्रकार होने के नाते मैं पूछना चाहूंगा कि यह तुम किस प्रकार की रिपोर्टिंग कर रही हो? एक साधारण सी बात को तुमने असाधारण बनाते हुए पहले तो उसका ध्रवीकरण किया और अब दो देशों को जंंग के मुहाने पर खड़ा करने का दुस्साहस कर रही हो, तुम जानती हो जंग.... अभी मैं इतना ही कह पाया था कि उसने कहा- मुझे मेरा काम करने दीजिए। 
यह कहते हुए वह मेरे पास से चली गई और मछली को फोकस करते हुए लोगों को एकबार फिर बताने लगी, आप अद्भुत चमत्कार को देख सकते हैं कि कुछ समय पहले जलपरी पर जो शब्द पीले रंग से लिखा दिख रहा था अब उसका रंग हल्के हल्के केसरी होता जा रहा है। 

पत्रकारिता के इस अंदाज को मैं क्या नाम दूं यह मेरी समझ से परे था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह किस प्रकार की पत्रकारिता है? सवालों के इस मकड़ जाल ने मुझे एक भावहीन स्तंभ बना दिया था, जिसमें से केवल एक ही आवाज़ मुझे गूंजती सुनाई दे रही थी कि यह युवती जब अपने घर परिवार के लिए भोजन बनाती होगी तो वह कितना स्वादिष्ट होता होगा। मज़ेदार, चटखारेदार बिल्कुल इस समाचार की तरह।
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शाहिद हसन शाहिद
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Sunday, January 10, 2021

फेसला देश का

मैं सुबह 5:00 बजे जब घर से सैर करने के लिए निकला तो धुंध इतनी अधिक थी कि हाथ को हाथ नज़र नहीं आ रहा था कुछ अंधेरा भी था। आजकल सूर्य उदय सुबह 7:00 बजे के बाद हो रहा था। अंधेरे और धुंध से लड़ता हुआ जब मैं गार्डन की ओर बढ़ा जा रहा था तब मैंने देखा कि कुछ लोग तेज़-तेज़ क़दमों के साथ वापिस घर की ओर दौड़े जा रहे हैं, इन भागने वालों में खास बात यह थी कि सब के हाथों में शराब की बोतलें थीं, इनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके दोनों हाथों और कोट की जेब में भी बोतलें नज़र आ रही थीं। मुझे बड़ी हैरानी हुई कि इतनी सुबह यह लोग इतनी बड़ी संख्या में शराब कहां से ला रहे हैं। तभी मैंने देखा कि उनमें से एक व्यक्ति ने अपने एक साथी को रोक कर उसके कान में कुछ कहा तो वह व्यक्ति भी तेज़ी के साथ सड़क की दूसरी ओर दौड़ने लगा। मैंने दौड़ते हुए उस व्यक्ति को रोकते हुए पूछा- भाई क्या हुआ कहां भागे जा रहे हो? उसने कहा कि हाईवे पर एक्सीडेंट हो गया है वहीं जा रहा हूं। एक्सीडेंट का सुनकर मैं भी स्वयं को रोक नहीं सका और दौड़ाता हुआ हादसे की जगह पहुंच गया। वहां पहुंच कर मैंने देखा कि एक व्यक्ति जो कार चला रहा था वह  
जख्मी अवस्था में ड्राइवर की सीट पर बेहोश पड़ा है। जबकि उसकी कार के चारों पहिये गायब हैं और वह ईंटों से बने प्लेटफार्म पर खड़ी है। मैं कार के जब और ज्यादा करीब पहुंचा तो मैंने देखा कि उसकी ऐसिसरीज़ भी गायब हैं और कार के चारों तरफ शराब की पेटियों के खाली डिब्बे बिखरे पड़े हैं। मैंने जब जख्मी का मुआयना किया तो उसको जीवित पाया। करीब ही एक व्यक्ति को उल्टी करते देखा शायद उसने अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति को इतना जख्मी देखा होगा। कुछ लोग इस हादसे पर अपनी प्रतिक्रिया यह कहते हुए भी सुने गए कि यार सुबह- सुबह मूड खराब हो गया। घायल की स्थिति कुछ ऐसी थी कि उसको अकेले कार से नहीं निकाला जा सकता था। मैंने आगे बढ़ कर लोगों से कहा- आप लोग क्या देख रहे हैं? कुछ लोग मिलकर घायल को निकालते क्यों नहीं यह अभी जिंदा है। मेरी बात सुनकर कुछ लोग यह कहते हुए वहां से खिसक गए कि हम पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते, सब कुछ तो लोग लूट कर ले गए हैं हम कहां तक जवाब देते फिरेंगे। मैं अकेला उसकी जिंदगी बचाने में असमर्थ था इसलिए मैंने बगैर देर किए लगभग सुबह 6:00 बजे पुलिस को फोन किया और हादसे का पूरा विवरण उनको बताया और यह भी बताया की एक्सीडेंट सड़क किनारे खड़े एक ट्रक से टकरा जाने से हुआ है जो अनुमानुसार लगभग सुबह 4:00 बजे हुआ होगा। मैंने पुलिस को यह भी बताया कि एक व्यक्ति बुरी तरह घायल है जो अभी जिंदा है जिसको फोरी मेडिकल ऐड द्वारा बचाया जा सकता है। मेरी सूचना प्राप्त होने के दो घंटे बाद 13 किलोमीटर का सफर तय करके मुक़ामी पुलिस लगभग 9:00 बजे घटनास्थल पर पहुंची। जरूरी कार्रवाई करने के बाद जब पुलिस 16 किलोमीटर दूर उस घायल को अस्पताल लेकर पहुंची तो उस समय तक घायल दम तोड़ चुका था।
मैं और कुछ लोग पुलिस के साथ सहानुभूति के तौर पर अस्पताल तक गए। पुलिस ने हमारे सामने जब मृतक की तलाशी ली तो उसका पर्स, मोबाइल, हाथ की घड़ी या कोई भी पहचान पत्र ऐसा नहीं मिला जिससे उसकी पहचान हो जाती, तभी साथ गए किसी व्यक्ति ने कहा कि घायल के कपड़े बता रहे हैं कि वह शराब का तस्कर होगा उसकी बात का बाकी लोगों ने भी समर्थन किया फिर उसने अपनी बात पर मोहर लगाते हुए कहा कि ऐसे देशद्रोही का यही अंजाम होना चाहिए।
कपड़ों से हुई इस पहचान और फेसले को सुनकर मैं अपना सर पकड़कर बैठ गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे देश को यह क्या हो गया है कि लोग कपड़ों से लोगों को पहचान कर फेसले भी लेने लगे हैं। मेरे दिल में अचानक यह ख्याल आया कि जंगल राज में ऐसा ही होता है। कोई एक बहुबली जंगल का शेर बनकर शिकार करता है फिर उस मरे हुए शिकार को जंगल के दूसरे कमज़ोर जानवर दावत समझकर चट कर जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ है। धुंध ने एक इंसान को मार दिया और लोगों ने मरते हुए इंसान की परवाह नहीं की बल्कि उसकी कार का सारा सामान और उसके मालिक को भी लूट लिया। अब मरने वाले के कपड़े देखकर फेसला सुना रहे हैं कि मरने वाला अपने कपड़ों से तस्कर लगता है इसलिए ऐसे लोगों का यही अंजाम होना चाहिए। इन लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर कोई सवाल नहीं खड़े किए और ना ही उन लूटने वालों लोगों की भूमिका पर कुछ कहा जो एक जख्मी को लूट कर जश्न मना रहे थेे बल्कि मरनेे वाले को मुजरिम साबित करके उसके खिलाफ फेसला सुनाने का हौसला दिखा रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इनको कौन भ्रमित कर रहा है। वह कौन फक़ीर है जो लोगों को कपड़ों से पहचानने का यह चमत्कारी मंत्र इनको सिखा रहा है।
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शाहिद हसन शाहिद
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Wednesday, December 30, 2020

नाम नहीं बताऊंगा

मुझे आज जिस व्यक्ति का इंटरव्यू करना था वह अपनी वेशभूषा से किसान लग रहा था और मेरे स्टूडियो में उसी लापरवाही से बैठा था जैसा कि कुछ समय पहले वह धरना स्थल पर अपनी ट्रेक्टर ट्राली में बैठे था। स्टूडियो मैं लगे कैमरों से वह डरा हुआ नहीं था बल्कि मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह कैमरों को डराते हुए कह रहा हो कि अब मैं तुमको बताऊंगा कि मैं कौन हूं।
मेरा अनुभव कहता है कि आजकल मध्यवर्ग में क्रोध का स्तर कुछ अधिक बढ़ा हुआ है। उसको सरकार से इतनी शिकायतें हैं कि ज़रा सी बात पर यह वर्ग उग्र हो जाता है।  यही मध्यवर्ग आजकल किसानों की शक्ल में संघर्ष करते हुए सड़कों पर है। जितना क्रोध इस समय इस वर्ग में है उतना गरीबी की रेखा से नीचे जीवन जीने वाले गरीबों या अमीरों में नजर नहीं आता।
मैंने उस व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक कई बार देखा मुझे ऐसा लगा कि यह एक व्यक्ति ना होकर स्वयं मुकम्मल आंदोलन है, जो मेरे प्रश्न पूछते ही फट जाएगा और पल भर में सरकार विरोधी शिकायतों की फेहरिस्त खोल कर रख देगा। मैंने इंटरव्यू आरंभ करते हुए उससे पूछा- तुम्हारा नाम क्या है।
उसने मेरे शक को सही साबित करते हुए एक प्रकार से फटते हुए मुझसे ही प्रश्न कर दिया- क्या मेरी बेइज्जती करने के लिए बुलाया है?
मैंने अपने लेहजे में नरमी बरतते हुए कहा- नाम पूछना बेज्जती नहीं होती है। इंटरव्यू का नियम होता है कि इंटरव्यू देने वाले का नाम पूछा जाए। तुम अपना नाम बताओ ताकि हमारे दर्शकों को मालूम हो सके कि वह किसकी बात सुन रहे हैं।
उसने कहा- मैं अपना नाम सर्वजनिक नहीं करना चाहता इस कारण नाम नहीं बताऊंगा।
संवाद को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा- ऐसा क्या है तुम्हारे नाम में जो तुम सर्वजनिक नहीं करना चाहते। तुम इस समय नेशनल चैनल पर हो, करोड़ों लोग तुम्हारा नाम जानना चाहते हैं। पर मैं करोड़ों लोगों को अपना नाम नहीं बताना चाहता, उसने साफ शब्दों में कहा।
मैंने पूछा- इसका कारण?
उसने कहा-मेरी पहचान किसान है जो नाम बताते ही समाप्त हो जाएगी।
नाम से किसानियत का क्या संबंध है, मैं समझा नहीं। उसने कहा-बहुत गहरा संबंध है,आप अपना इंटरव्यू शुरू कीजिए।
यह समस्या तो बड़ी गंभीर है मैंने एक बार फिर कौशिश की। उसने कहा-ऐसा ही समझ लीजिए। मैंने संवाद जारी रखते हुए अपने चर्चित पत्रिकाना अंदाज में कहा-मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारा नाम मुगल कालीन की याद दिलानेे वाला है ?
उसने प्रश्न का उत्तर ना देते हुए केवल इतना कहा कि जब मैं अपना नाम बताऊंगा तो परेशानी मेरे लिए कम तुम्हारे लिए ज्यादा खड़ी हो जाएगी।
मैंने चौंकते हुए उससे पूछा ऐसा क्यों?
उसने कहा-मान लो अगर मैंने अपना नाम तुम्हारी अटकलों के अनुसार मुगलकालीन युग से संबंधित बता दिया तो तुम असल मुद्दों से भटक कर मेरा नाम बदलने, मेरी घर वापसी या मेरे नाम के पीछे पाकिस्तान या चायना को तलाश करने लग जाओगे, जैसा कि भविष्य के अनुभव कहते हैं और वैसे भी तुम्हें मेरे नाम से क्या लेना देना है तुमने तो स्वयं मेरा नाम अन्नदाता रखा था फिर अचानक ही तुमने मुझे इतने नाम दे दिए कि मैं स्वयं कंफ्यूज हूं कि मैं स्वयं को टुकड़े टुकड़े गैंग कहूं, अर्बन नक्सल कहूं, दलाल, राजद्रोही, आतंकवादी, खालिस्तानी कहूं। इन सबके अतिरिक्त आलसी, निठल्ले, बहके हुए लोग कहते हुए पिछले एक माह से तुम्हारी जुबान नहीं थकी है। लोगों ने अपने भाषणों में या अपने ट्वीट द्वारा मुझे इन नामों से केवल एक बार ही बदनाम किया होगा जबकि तुम्हारे चैनल 24 घंटे मैं कई हजार बार इन नामों के सहारे कभी मेरे संघर्ष पर घड़ियाली आंसू बहाकर तो कभी मेरे मान सम्मान पर सिधा हमला करके मुझे रूसवा कर रहे हैं। अब तुम मुझे किसी भी नाम से पुकारो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर उसने एक गहरी सांस ली और थोड़ा रुक कर बोला मुझसे तुम किसी नए नाम की उम्मीद क्यों रखते हो। मैं नहीं चाहता कि इस संघर्ष के गर्भ से जन्म लेने वाली आवाज़ के चेहरे पर एक नए नाम का टेग अभी से लगा दिया जाए, ताकि तुम उसको पंजाब, हरियाणा, यूपी, महाराष्ट्र या हिंदू, मुसलमान,सिख, ईसाई और जातियों में बांट कर उसको कमजोर कर सको। यह कहते हुए वह भावुक हो गया और उसकी आंख से एक आंसू टपक कर जब जमीन की ओर बढ़ने लगा तो मैं चाहते हुए भी उसको अपने हाथों की हथेली पर सजा नहीं सका क्योंकि पत्रकारिता मेरी मजबूरी थी।
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शाहिद हसन शाहिद

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Sunday, December 20, 2020

मैं भी किसान हूं

अचानक मेरे अंदर का किसान जाग उठा और बाग़ियाना अंदाज में कहने लगा कि मैं भी किसान हूं और आंदोलन में शरीक होने के लिए सिंधु बॉर्डर पर जाना चाहता हूं।
मैंने उसको हैरत से देखा और पूछा तुम कब से किसान हो गए?
उसने भी मुझे प्रश्नवाचक नजरों से देखा और कहा- मैं तुम्हारे अंदर एक साहित्यकार की भूमिका में काफी समय से छवियां गढ़ने का रचनात्मक कार्य कर रहा हूं। भिन्न भिन्न प्रकार की पृष्ठ भूमियों पर चरित्र पैदा करके तुम्हारी कहानियों को जीवन्त करता रहा हूं। इसके पश्चात भी क्या मुझे यह बताने की आवश्यकता है कि मैं भी किसान हूं, तुमको ज्ञात होना चाहिए कि जो व्यक्ति किसी भी प्रकार से कुछ भी पैदा कर रहा है वह किसान है। मैं छवियां पैदा करने वाला किसान हूं और अपने किसान भाइयों के संघर्ष को बल देने के लिए संघर्ष स्थल पर जाना चाहता हूं। 
उसकी दलील सुनने के बाद मैंने कहा- मैं समझ गया गमले में पुदीने की खेती करने वाले किसान की तरह तुम भी एक किसान हो,पर इसके लिए संघर्ष का ही रास्ता क्यों?  
मुझे इस समय किसान कई वर्गों में बटे नज़र आ रहे हैं, एक वर्ग संघर्ष कर रहा है, जबकि दूसरा सम्मेलन। तुम सम्मेलन वाले किसान क्यों नहीं हो जाते जहां खतरा कम है कुछ ना करने के पश्चात भी रंग चोखा है।
संघर्ष का दूसरा नाम ही किसान है, सम्मेलन तो तुम्हारे जैसे साहित्यकार, राजनीतिक या मुद्दों से फरार होने वाले लोग करते हैं। उसने मेरे बग़ैर  मांगे सुझाव का उत्तर देते हुए कहा।
अब मैं समझा कि कुछ लोग किसानों को अर्बन नक्सल क्यों कह रहे हैं। मैंने एक बार फिर उसको अपने कटाक्ष के निशाने पर लेते हुए कहा। उसने मेरी बात सुनी अनसुनी करते कहा- मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है, लेकिन मैं यह जानता हूं कि तुम्हारी वे सब कहानियां जो तुमने समाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हुए लिखी हैं और जिस पर तुमको बड़ा गर्व है वे सब बकवास हैं। 
यह अचानक से मेरी कहानियां बकवास किस प्रकार हो गयीं उनको तो लोगों ने पसंद किया है उनकी प्रशंसा की है। मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा तो उसने कहा, बर्फ जैसी ठंडी रात में खुले आसमान के नीचे संघर्ष करने वाले किसानों के साथ ना तो तुमने अभी तक ठंडी चाय पी है और ना ही उनके साथ लकड़ी जलाकर अलाव पर हाथ तापें हैं। मैंने उसकी बात को बीच में ही रोकते हुए कहा कि देसी गीजर से हुए गरम पानी से नहाते हुए भी तुम ने मुझे नहीं देखा होगा। उसने कहा- ठीक है....! इन कड़े अनुभवों से जब तक तुम नहीं गुज़रोगे किसानों की ही नहीं किसी भी समाजिक संघर्ष की कहानी नहीं लिख सकते यह मेरा विश्वास है। मैंने संवाद को आगे बढ़ाते हुए कहा- लंगर में काजू किशमिश,बादाम और पिज़्ज़ा खाने के बाद जिम और मसाज का मज़ा लेने वाले किसानों के संघर्ष की कहानी मैं नहीं लिख सकता इतना सुनकर ही मेरा पेट खराब हो जाता है।
काजू बादाम सुनकर पेट नहीं खराब होता है किसानों के कंधों पर रखी वह अदृश्य बंदूक देखकर तुम्हारा पेट खराब हो जाता है जिसका भय दिखाकर सरकार विपक्ष को निशाना बना रही है। उसने तुरंत उत्तर देते हुए कहा।
यह बात तुमने ठीक कही, बंदूक जैसी कोई चीज इस संघर्ष में डराने का काम तो कर रही है यह मैं भी महसूस कर रहा हूं। 
मेरी बात सुनकर वह एक क्षण के लिए खामोश हुआ और फिर बोला कुछ लोगों कह रहे हैं कि किसानों को संयोजक ढंग से भ्रमित किया जा रहा है तुमने सुना और भय के कारण आंखें बंद कर लीं और खामोश हो गए परंतु जब किसानों ने कहा कि हमको भ्रष्टाचारी,आतंकवादी,अर्बन नक्सली,टुकड़े टुकड़े गैंग,देशद्रोही, खालिस्तानी और बारबाला एंटोनियो के गुलाम कहकर बहुत सी बंदूकों से गोलियां दागी जा रही हैं तो तुम किसानों पर लगाए गए पचास लाख के जुर्माने के ज़िरो गिन्ने में व्यस्त रहे। यह कहां का इंसाफ है अंतरात्मा भी कोई चीज होती है। इतना कहकर उसने मुझे सोचने के लिए छोड़ दिया। 
अब मैं सच कहूं तो सच्चाई यह है कि मेरे अंदर मौजूद किसान ने मुझे अंतरात्मा की उस कसौटी पर खड़ा कर दिया है जहां मेरे लिए यह फेसला करना मुश्किल है कि आंखों पर काली पट्टी बांधकर इंसाफ करने वाली देवी की जगह अगर मैं स्वयं होता तो मुझे किसान की मर्यादा पर चली गोलियां नज़र आतीं या छुपा हुआ वह एजंडा, जो किसान को किशमिश बादाम की जगह भविष्य में सूखे चने खाने पर मजबूर कर देगा।
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Thursday, December 10, 2020

ज़िद्दी बुड्ढा

मेरी पत्नी मेरी परवाह नहीं करती, मेरी बेटी मेरी बात नहीं सुनती, बेटा प्राय: मुझसे नाराज़ रहता है। बहू द्वारा मेरा निरादर करना आम 
बात है, करीबी रिश्तेदार मुझसे दूर भागते जा रहे हैं संक्षेप यह कि किसी के पास मेरे लिए ना तो समय है ना आदर-सम्मान। मोदी सरकार की तरह हो गया हूं मैं, कोई मुझसे खुश ही नज़र नहीं आता। जिसको देखो वह धरना प्रदर्शन कर रहा है। दिन प्रतिदिन दयनीय होती मेरी हालत पर लोग हंसते और मज़ाक उड़ाते तो नज़र आते हैं पर समाधान के लिए बढ़ते हाथ नज़र नहीं आते, बहुत तनाव भरी परिस्थितियों से गुजर रहा हूं मैं आजकल।
मेरे एक बुजुर्ग मित्र ने जब मुझसे अपना यह दर्द बयान किया तो मैं भावुक हो गया जबकि मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि इस आधुनिक मशीनी युग में इस बुजुर्ग की यह अकेली कहानी नहीं है यह कहानी तो अब घर घर की कहानी बन चुकी है, पता नहीं इस युग के बच्चों को यह क्या हो गया है कि वे अपने बुजुर्गों का आदर-सत्कार करना ही भूल गए हैं। 
टूटते रिश्तों और दम तोड़ती मर्यादा को पुनः स्थापित करने में अपनी भूमिका तलाश करते हुए मैंने उस बुजुर्ग से एक बुद्धिजीवी की तरह समझाया कि आप शब्दों की शक्ति को भूल गए हैं इसलिए दुखी हैं आप भूल गए हैं कि शब्द तोप और तलवार से भी अधिक शक्तिशाली होते हैं यह जानते हुए भी आपने तोप और तलवार तो उठा ली है और उन शब्दों को भूल गए हैं जो जख्मों पर मरहम से ज्यादा तेज काम करते हैं। मेरी बात सुनकर बुजुर्ग ने मुझे शक भरी नजरों से घूरते हुए कहा-तुम कहना क्या चाहते हो ?
मैंने विश्वास भरे स्वर में कहा-दुनिया की समस्त समस्याओं का हल चंद शब्दों के जादू में छुपा है। शब्दों से जादू करना सीख लीजिए और फिर देखिए चमत्कार कि किस प्रकार आप से नफ़रत करने वाले भी आपके प्रिय बन जाते हैं।
बुजुर्ग ने शक भरी नज़रों से मेरी ओर देखा, जैसे मैं कोई पेशावर जादूगर हूं, जो अपने शब्दों के जादू से जल्द ही अपनी जेब से खरगोश निकालकर उसे दिखा कर अचंभित कर दुंगा।
बुजुर्ग को आश्चर्य से देखते हुए मैंने पूछा- इस प्रकार क्यों देख रहे हैं, बात को समझिए लोगों के दरमियान समन्वय बनाने के लिए संवाद की आवश्यकता होती है और संवाद शब्दों से संभव होता है। आंकड़ों या इतिहास के पन्नों से नहीं। आपकी हर समस्या का हल शब्दों के इस जादू में छुपा है जो मैं आपको बताने वाला हूं।
बुजुर्ग ने जिज्ञासा से पूछा-वह जादुई मंत्र क्या है, जो मुझे नहीं आता और आप मुझे बताने वाले हैं।
मैंने कहा वह बहुत सरल है। आपको केवल कुछ शब्द अपने परिजनों से इस प्रकार कहना हैं कि मैंने तुम्हारी हर वह गलती जो तुमने मेरे आत्मसम्मान को पहुंचाई है उसके लिए मैं तुमको क्षमा कर रहा हूं अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, इन जादुई शब्दों के कहने के बाद आप कमाल देखिएगा कि किस प्रकार आपकी आत्मा पर आए सब घाव खुद-ब-खुद भर जाएंगे और आपके अपने आपको अपनी पलकों पर बिठाने के लिए विवश हो जाएंगे। आपको केवल अपने जादुई शब्दों पर पूरा उतरना पड़ेगा जो निस्वार्थ होंगे और याद रखना होगा कि किसी को क्षमा कर देना जीवन का वह मंत्र है जो जीवन को आशावादी व ऊर्जावान बना देता है। याद रखिए नाराज़गी का कारण दूसरे नहीं आप स्वयं होते हैं इसलिए पहल भी आपको स्वयं से ही करते हुऐ अपनी बहू, बेटी और पत्नी को उनकी गलतियों के लिए क्षमा करना होगा। इस प्रकार आप स्वयं को तनाव मुक्त कर पाएंगे। 
मेरे सकारात्मक सुझाव को बीच में रोकते हुए बुजुर्ग ने बड़ी हिकारत से मुझे देखा और अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेहराते हुए कहा- बातें बहुत अच्छी कर लेते हो परंतु वे स्वभाविक नहीं होती हैं, मैंने आश्चर्य से पूछा आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?
बुज़ुर्ग ने बड़ी सहजता के साथ कहा-मैं अपने परिजनों को अच्छी तरह जानता हूं आपका परामर्श मानकर अगर मैंने अपनी बहू बेटी और पत्नी से आपका बताया हुआ मंत्र कह भी दिया कि कोई बात नहीं मैंने तुम्हारी हर गलती के लिए तुमको क्षमा कर दिया है। अब मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है। सुख शांति बनाए रखो और आराम से रहो। जिसके उत्तर में उन्होंने पलटकर मुझसे यह कह दिया कि तुमसे क्षमा मांग कौन रहा है, ऐ- सटठियाए हुए बूढ़े और रही बात शिकायत की, तो वह हम सबको तुम से है, तुमको हमसे कोई शिकायत नहीं है, हम तो सामान्य तौर पर ही रह रहे हैं; परंतु तुमने अपने नए-नए नियमों व कानूनों से दुखी कर रखा है इसलिए हम तुमको माफ करने के बिल्कुल तैयार नहीं हैं। हमें तो सिर्फ तुमसे छुटकारा चाहिए।
इस परिस्थिति में आप अपने जादुई शब्दों को क्या नाम देंगे।
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शाहिद हसन शाहिद
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Monday, November 30, 2020

लव-जिहाद

मेरी चिंता का कारण यह नहीं है कि मुझे पेट भरने के लिए रोटी चाहिए, चिंता का कारण यह भी नहीं है कि मेरे सर पर छत का साया नहीं है, ना ही यह है कि मुझे शरीर ढकने के लिए कपड़े की आवश्यकता है। यह सब भौतिक सुविधाएं तो भगवान ने मुझे बेहिसाब दे रखी हैं। विलासिता पूर्ण जीवन, सुंदर व सुशील पत्नी, संस्कारी बच्चे, घनिष्ठ मित्रों की भीड़ के अतिरिक्त नौकरों की पूरी फौज,"जैसा आपका आदेश" कहने वाले 
जी-हज़ूर्ये, दूर वह क़रीब के रिश्तेदार, इज़्ज़त, दौलत हर प्रकार की चकाचौंध सब कुछ तो है मेरे पास फिर भी मैं मन से अशांत हूं। एक बेचैनी एक तनाव मैंने अपनी दौलत से खरीद रखा है, जो अब मेरा भाग्य बन चुका है और मैं अपने ही हाथ का खिलौना बन कर रह गया हूं।
पूरी पूरी रात जाग कर सीसीटीवी कैमरों द्वारा घर व बाहर की हलचल पर अपनी पत्नी, बहू,बेटियों और विशेषकर उस बड़ी-बड़ी स्टाइलिश मूछों वाले अपने पसंद के सिक्योरिटी गार्ड पर नज़र रखता हूं, जिसको विशेष तौर पर मैंने अपनी सुरक्षा के लिए नियुक्त किया है और जो हर समय हाथ बांधे मेरी सेवा में उपस्थित रहता है।
साहस, वीरता एवं पौरूष की प्रतीक उसकी मूछें दिन के समय मुझे और मेरे परिवार को प्रभावित वह उत्साहित रखती हैं। अपने सेवकों में मुझे वह पसंद भी अधिक है; परंतु रात आते ही उसकी शानदार मूछें मुझे लव-जिहाद के भूत की भांति डराने लगती हैं।
अपने कमरे के बाहर रात के समय जब मैं इन पहरेदार मूछों को अपनी व परिवार की सुरक्षा करते देखता हूं तो डर जाता हूं और भय के कारण पूरी-पूरी रात जागकर इन खतरनाक मूछों की मामूली सी मामूली हरकत पर नज़र रखता हूं ताकि यह मूछें कोई अनहोनी ना कर जाएं। मैं आपको सही बता रहा हूं कि मेरे मन ने इस अंजान भय को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि मेरी जरा सी भूल मेरे लिए काल बन सकती है और यह खतरनाक मूछें एक न एक रात कोई शिकार अवश्य कर डालेंगी।
इस खौफ के कारण ही मैं अपने कमरे में रखे सीसीटीवी मॉनिटर पर पूरी पूरी रात जाग कर नजरें जमाए बैठा रहता हूं ताकि ना निगाह हटेगी और ना दुर्घटना घटेगी।
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Friday, November 20, 2020

चटपटी चाट के पत्ते

मेरे दिल के डॉक्टर का कहना है कि मैं नमक और तेज मसालों का सेवन ना करूं क्योंकि मैं ब्लड प्रेशर का मरीज हूं।
हड्डियों का डॉक्टर कहता है कि दही,खट्टी- मीठी चटनी, छिलके दार दालें, दूध से तैयार किसी भी प्रकार के व्यंजन का सेवन ना करूं यह सब यूरिक एसिड उत्पन्न करते हैं। जिस कारण घुटनों का दर्द बढ़ जाता है।
मेरा अनुभव भी यही कहता है कि थोड़ा सा असंतुलित भोजन मेरे दिल की धड़कने तेज करने, सांस फूलने व घुटनों के दर्द को बढ़ाने के लिए प्रर्याप्त होता है।
स्वास्थ्य की इस खराब स्थिति के बावजूद, मैं अपनी फूली हुई सांस व एक वफादार दोस्त की तरह दिन-रात साथ रहने वाले अपने घनिष्ठ मित्र यानी घुटनों के दर्द के साथ नगर के मीना बाजार की मशहूर चाट वाली दुकान पर शाम होते ही पहुंच जाता हूं।
इस दुकान की चाट पापड़ी और गोलगप्पे अपने तीखे स्वाद और तेज़ मसालों के कारण शहर के चटोरों में काफी मशहूर हैं। दुकान पर स्वस्थ लोगों का हर समय मेला लगा रहता है।अब आप सोच रहे होंगे कि इन स्वस्थ चाट के चटोरों के बीच मेरा जैसा अस्वस्थ व्यक्ति जिस पर चाट खाने की पूर्णतः पाबंदी है वह अपने स्वास्थ्य का ख्याल ना रखते हुए चाट की दुकान पर जाने का जोखिम क्यों मोल लेता है? कौनसी ऐसी मजबूरी है कि बगैर चाट खाए यह व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता? चाट की दुकान से उठने वाले मसालों की सुगंध उससे कुछ भी अनर्थ करा सकती है। इन प्रश्नों के उत्तर में, मैं केवल इतना ही कहूंगा की चाट की दुकान पर जाना मेरी कोई मजबूरी नहीं है। मुझे स्वंय पर और अपनी ज़ुबान पर इतना यकीन और भरोसा है कि स्वादिष्ट चाट मेरी सेहत से खिलवाड़ करने का हौसला नहीं कर सकती। मेरे वहां जाने का कारण तो एक तलाश है जो मुझे उन गरीब बच्चों के दरमियान ले जाती है, जो चाट खाने की अपनी चाहत में अमीरों द्वारा फेंके चाट के झूठे पत्ते प्राप्त करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। नंग धड़ंग यह मासूम बच्चे अपनी फ्री स्टाइल कुश्ती दिखाते समय चोट भी खा जाते हैं फिर भी हार नहीं मानते और झूठे पत्तों को अपना हक़ समझते हुए अपनी जद्दोजहद में अपने ही भाइयों के साथ लड़ने का कौशल अमीरों को दिखाते नहीं थकते हैं, जबकि चाट खाने के शौकीन लोग अपने मनोरंजन के लिए अपने चाट के झूठे पत्ते उन बच्चों की ओर रुक-रुक कर फेंकते हैं, ताकि तमाशा जारी रहे। मैं तो केवल एक मुर्दा समाज की तरह यह देखने जाता हूं कि यह गरीब बच्चे कब बड़े होंगे और कब इस बात को समझेंगे कि उनकी गरीबी का मजाक उड़ाने वाले इन अमीरों के लिए वह कब तक मनोरंजन का साधन बनते रहेंगे। अमीरों की सोच में कब बदलाव आएगा यह मैं नहीं जानता या उन में कब कोई ऐसा अमीर पैदा होगा जो इस मनोरंजन के बाद या पहले इन बच्चों को एक चाट का पत्ता खिलाने का हौसला रखता हो यह भी मैैं नहीं जानता, हां...! यह अवश्य जानता हूं कि बच्चे गरीब हैं, पिछड़े हैं और जरूरतमंद हैं।अमीरों को सोचना चाहिए की चाट की खुशबू और चोट का दर्द तो सब को एक ही समान विचलित करता है चाहे वह अमीर हो या गरीब हो।

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Tuesday, November 10, 2020

मुझे इंटरव्यू देना है

साधू सा देखने वाला एक व्यक्ति मेरे कार्यालय मैं आया और कहने लगा- मुझे इंटरव्यू देना है, पत्रकार बुलाओ।
मैंने सर से पैर तक उसको कई बार देखा और मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह नया नया साधू बना है, पहले यह निश्चय ही मिडिल क्लास का रहा होगा, उसकी मनोस्तिथि देखते हुए मैंने उससे कहा दिया कि हम साधू-संतों के इंटरव्यू नहीं करते हैं। इतना सुनते ही वह क्रोधित हो गया और बिगड़ कर कहने लगा-
इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी कोई इज्जत ही नहीं है। उसके गुस्से को देखते हुए मैंने कहा- इज्जत है, परंतु वह 5 वर्ष बाद तुमको मिलती है अभी समय नहीं आया है,जब समय आएगा तो इज्जतदार लोग तुम्हारे दरवाजे पर इज्जत लेकर पहुंच जाएंगे उस समय तुम इज्जत दार बन जाना और इंटरव्यू देना। मेरा कटाक्ष सुन कर उसने शक भरी नज़रों से मुझे देखा और पूछा- तुम कौन हो? मैंने कहा- लेखक...! लेखक सुनते ही उसने बुरा सा मुंह बनाया और कहा- मुझे तुमसे बात नहीं करनी है, मुझे दबंग पत्रकार चाहिए, जो आंखों में आंखें डालकर कड़क आवाज मैं पूछ सके मुझे जवाब चाहिए। ऐसा पत्रकार बुलाओ। मैंने कहा- मैं पत्रकार भी हूं और लेखक भी टू इन वन। उसने टू इन वन पर गौर ना करते हुए कहा -लेखक पत्रकार नहीं हो सकता। उसका स्पष्ट विश्लेषण सुनकर मैंने कहा- अब लेखक और पत्रकार में कोई फर्क नहीं रह गया है, बड़े-बड़े नेताओं के इंटरव्यू अब लेखक ही पत्रकार बनकर कर रहे हैं और तुम कह रहे हो कि लेखक पत्रकार नहीं हो सकता
तुमको मालूम नहीं की देश बदल चुका है,अब लेखक ही नहीं फिल्मों के नायक भी इंटरव्यू करने लगे हैं।पत्रकार तो केवल अपने स्वामी द्वारा दिए हुए निर्देशों का पालन करते हुए केवल चीखने चिल्लाने तक ही सीमित रह गए हैं। अपनी बात बीच में रोकते हुए मैंने उससे कहा- छोड़ो इन बातों को तुम बताओ इंटरव्यू क्यों देना चाहते हो? उसने कहा- तुमने अभी कहा था कि देश बदल चुका है, जो गलत है, मैं कड़े शब्दों से इसका खंडन करता हूं ,देश नहीं बदला है, लोग बदल गए हैं। हमारे मालिक बदल गए हैं जिन्होंने या तो हमको देश के अमीरों को बेच दिया है या गिरवीं रख दिया है। मेरी गरीबी इसका सबूत है। पर इस समय मैं अपनी गरीबी पर बात करने नहीं आया हूं और ना ही यह बताने आया हूं कि मैं जन्मजात साधू नहीं हूं। मैं तुम्हारे कार्यालय में अपने साथ हुए धोखे पर बात करने आया हूं,उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने आया हूं। मैंने उसकी पीड़ा को समझते हुए सहानुभूति दिखायी और पूछा-तुम्हारी अपनी पहचान खत्म होने से भी ज्यादा बड़ा कोई और नया धोखा हुआ है ? उसने कहा हां...! आज सुबह ही हुआ है। मैंने पूछा कैसा धोखा हुआ है और किसने दिया है? उसने एक समाचार पत्र मुझे दिखाते हुए कहा- इस समाचार पत्र ने मुझे धोखा दिया है। मैंने समाचार पत्र हाथ में पकड़ते हुए पूछा- इसने क्या धोखा दिया है तुम को? उसने कहा- मैंने सुबह का नाश्ता नहीं किया है,चाय भी नहीं पी है। उसकी इन बातों का अर्थ ना समझते हुए मैंने पूछा- इसमें समाचार पत्र का क्या दोष है? उसने कहा-केवल ₹3 ही थे मेरे पास, मैंने चाय नहीं पी उन पैसों से समाचार पत्र खरीद लिया। अब तुम खुद ही देख लो,12 पन्नों के इस पत्र में 9 पन्नों पर पूरे पूरे पेज के विज्ञापन हैं जिन में अधिकतर में सरकार की उन नीतियों का उल्लेख है जो धरातल पर कहीं नहीं हैं, फिर उसने मेरी ओर देखा और कहा, हमारी कोई इज्जत ही नहीं है हमें फेक न्यूज़ बेची जा रही हैं। मैंने उसकी पूरी बात सुनने के बाद उस से कहा -तुम्हें समाचार पत्र नहीं खरीदना चाहिए था तुम इन पैसों की चाय पी लेते। उसने कहा मुझे अपने बच्चों की फिक्र है। तुम ही बताओ क्या हमारे बच्चों की सब आवश्यकताएं सन्यासी हो गई हैं। देश में सब कुछ ठीक चल रहा है। सब ने सुबह की चाय पी ली है। सबके हाथ में मिनरल वाटर की बोतलें थमा दी गई हैं। सबको भरपेट पिज़्ज़ा व फल फ्रूट मिल गए हैं। सब स्वस्थ हो गए हैं। सब बच्चे नौकरी करने लगे हैं। सबको कोरोना वैक्सीन मिल गई है। यही सब कुछ जानने के लिए मैंने समाचारपत्र खरीदा था परंतु वहां व्यवसाय और बाज़ारबाद तो मिला पर देश या उसकी मूल समस्याएं नहीं मिलीं। सब फ्रॉड है। मेरे ₹3 डूब गए।
अपनी सारी पूंजी डुबो देने वाले व्यक्ति का दुख सुनने के बाद मैं यह नहीं समझ पाया कि इसको किन शब्दों से समझाऊं कि हमारे देश ने विकास की जिस गति को अपनाया है उसमें गरीब या उसकी समस्याओं को कोई स्थान नहीं है, परंतु यह शब्द मैं उससे कह नहीं सका वह अब भी भावुक होते हुए यही कह रहा था कि मुझे इंटरव्यू देना है। पत्रकार बुलाओ। 
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शाहिद हसन शाहिद
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Sunday, November 1, 2020

पहचान कौन ?

पहचान तो लिया होगा....! दरवाजे पर खड़ी गेहूं के आटे से बनी रोटी ने मुझसे इस प्रकार पूछा,जैसे वह खाने लायक रोटी ना होकर तलाक शुदा पत्नी हो और कटाक्ष करते हुए पूछ रही हो, पहचान कौन ?
मैंने गंभीर होते हुए उससे कहा-पहचान लिया और क्यों नहीं पहचानूंगा ? तुम वही रोटी हो जिसने युगों-युगों से समय का पहिया थाम कर रखा है। जिसने अपना रुतबा फकीरों की कुटिया से राजाओं के महलों तक हमेशा बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है। जिसके लिए बार-बार युद्ध लड़े गए हैं और आज भी लड़े जा रहे हैं। तुम्हारे ना मिलने से कई मानव जातियां भूख के समंद्र में गार्क होकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। मैं जानता हूं तुम वही हो जिसकी तलाश में लोग अपना देश,परिवार और अपनी पहचान तक छोड़ देते हैं। 
रोटी ने धैर्य के साथ अपनी प्रशंसा या कथा सुनी और कहा ठीक कह रहे हो तुम....! मेरी आवश्यकता हर समय हर व्यक्ति,हर समाज और हर जीवित प्राणी को रही है। मेरा महत्व कल भी था और आज भी है और भविष्य में भी इसी प्रकार बना रहेगा, तुम यह भी जानते हो की मुझे प्राप्त करने के लिए सख्त मेहनत की शर्त हमेशा रही है। परंतु समय के बदलाव के कारण अब उस शर्त के अतिरिक्त कुछ नए बदलाव आ गए हैं। इन नए बदलाव के कारण ही मुझे घर-घर जाकर लोगों से पूछना पड़ रहा है कि नई शर्तें पूरी करेंगे तभी मैं उनका पेट भरने का आश्वासन दूंगी। 
यह रूप रोटी का मैंने पहली बार देखा था कि वह घर घर जाकर पूछ रही थी कि मेरी आवश्यकता है,तो मेरी शर्तें पूरी करो,तभी मैं तुम्हारा पेट भरने के लिए तैयार हूंगी। इसका अर्थ यह हुआ कि दरवाजे- दरवाजे रोटी का भटकना स्मृद्धि या विकास का कारण नहीं है, जैसा कि पहले मेरे मन में विचार आया था या अनुभव था। यह एक लक्ष्य था जिसको प्राप्त करके ही रोटी गृह प्रवेश कर सकती थी। 
रोटी के इस रूप को देखकर मैं अचंभित हो उठा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं रोटी के प्रस्ताव पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया दूं। अमीर और गरीब का भेदभाव ना रखने वाली रोटी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा था कि वह पेट भरने के लिए मेहनत के अतिरिक्त किसी दूसरी शर्तों का सहारा ले रही हो। मेरे मन में एक प्रश्न आया और मैंने उससे पूछा- घर में प्रवेश के लिए मेहनत के अतिरिक्त और क्या शर्त है तुम्हारी?
रोटी ने स्वयं को हवा में लहराते हुए कहा- शर्त, अनिवार्य भी है, जो मेहनत द्वारा मुझे प्राप्त करने से अतिरिक्त है। इससे पहले तो मेहनत के अतिरिक्त कोई और शर्त तुमको पाने के लिए नहीं होती थी। मैंने तर्क देते हुए पूछा।
वह समय मूर्खों का था,अब समय बदल गया है, रोटी ने दो टुक जवाब देते हुए कहा।
मैं समझ गया मुझे अपना आधार कार्ड किसी संस्था के साथ लिंक कराना पड़ेगा। यह भी अनिवार्य है,इसके अतिरिक्त भी एक शर्त और है। रोटी ने अपने शब्दों पर जोर देते हुए उत्तर दिया। वह क्या है ? मैंने अचंभित होते हुए पूछा- उसने कहा राष्ट्रवाद साबित करने के लिए वंदे मातरम सुनाना अनिवार्य है। 
रोटी की शर्त सुनते ही मैं अचंभित रह गया। मुझे तुरंत अपने पड़ोसी का ख्याल आ गया जिसको वंदे मातरम नहीं आता था जबकि रोटी की उसे सख्त आवश्यकता थी। मैंने रोटी से कहा- तुम्हारी आवश्यकता मुझे भी है और मेरे पड़ोसी को भी है, परंतु तुम्हारी शर्त पूरी करने के लिए मुझे 2 दिन का समय चाहिए। रोटी ने मेरा चेहरा देखते हुए प्रश्न करते हुए पूछा- तुमको वंदे मातरम नहीं आता है, तुम समय क्यों चाहते हो? मैंने कहा-आता है परंतु मेरे पड़ोसी को नहीं आता है। मैं इन 2 दिनों में अपने पड़ोसी को वंदे मातरम याद करा दूंगा।
यह कहते हुए मुझे अपने शब्दों में खुशामद का भाव साफ नजर आ रहे थे जबकि रोटी का चेहरा भावहीन था किसी हिटलर की तरह।
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Wednesday, October 28, 2020

सफेद दाढ़ी

किसी ने मुझसे कहा- तुम्हारी दाढ़ी काफी बड़ी और सफेद हो गई है, तुम इसका फायदा क्यों नहीं उठाते? मैंने उसको हैरत भरी नजरों से देखा....! उसने परवाह ही नहीं की और कहा-पैसा कमाओ इस से, मुझे मत देखो। मैंने हैरत से पूछा- दाड़ी से पैसा किस प्रकार कमाया जा सकता है। दाढ़ी मेरे चेहरे का नूर है, किसी मशीन का पार्ट या हाथ का हुनर नहीं है। जो रोज़ी-रोटी कमाने में सहायक हो। उसने कहा तुम बेवकूफ हो एक अच्छी मासूम सी भोली भाली सूरत लेकर भूखे मर रहे हो, जबकि दाढ़ी बढ़ा कर लोग करोड़ों कमा रहे हैं। तुम्हारी जैसी खूबसूरत दाढ़ी तो क़िस्मत से मिलती है। फायदा उठाओ,इस से जो बहुत आसान है। मैंने उससे कहा- कुछ बताओगे भी या यूं ही ऊल जलूल बातें करते रहोगे। उसने मेरी ना समझी पर तरस खाते हुए कहा- यह दौर सोशल मीडिया का है और मैं देख रहा हूं कि जिन लोगों को दीन (धर्म)के बारे में कुछ भी नहीं मालूम वह भी अपनी बढ़ी हुई दाढ़ियों और कैमरों के सहारे दीन के लिए मॉडलिंग करके मोटी रकमें कमा रहे हैं। किसी माहिर एक्टर की तरह एक्टिंग करते हैं और अपनी रटी रटाई तक़रीर कंप्यूटर से पढ़ कर लोगों को उनकी जिंदगी मैं दीन की अहमियत,शिक्षाएं और इस्लामी क़िस्से, कहानियां सुनाते नज़र आते हैं। उनकी जुबान मैं अरबी,फार्सी के अल्फाज कम इंग्लिश के ज्यादा होते हैं, ताकि लोग उनकी गुफ्तगू पर तव्वजह दें और उनकी दाढ़ी और इंग्लिश के रोब को महसूस करते हुए ज्यादा से ज्यादा लाइक कर सकें।
मैंने सोशल मीडिया पर बहुत से उल्मा को दीन की बातें करते हुए और लोगों को बगैर इंग्लिश अल्फाज के भी गुफ्तगू करते हुए देखा व सुना है। उसने कहा हां देखा होगा सोशल मीडिया पर दीन सिखाने वालों में बहुत से ऐसे भी हैं जो यह कह कर दीन सिखाते नज़र आते हैं कि वह नए-नए मुसलमान बने हैं, उन्हें दीन के बारे में ज्यादा इल्म तो नहीं है। वह मुसलमान बनने से पहले एक मशहूर गायक,खिलाड़ी,डॉक्टर,
लोहार,बढ़ाई,साइंटिस्ट या कोई बड़ेबिजनेसमैन थे। मुसलमान बनने के बाद खुदा ने उनको अचानक ग़ैबी या रूहानी ताकतों से नवाज़ दिया, इस प्रकार वह लोगों को गुमराही से निकालने का काम करते हैं या खुद को उस गुमरही मैं तलाश करके दीन की तबलीग़ करते हैं। मैंने कहा, यहां तक तो ठीक है पर दाढ़ी के जरिए पैसा किस तरह कमाया जा सकता है। उसने कहा- दीन की तबलीग़ से तालुक़ रखने वाले दो तीन वीडियो देख लो तुम्हारी खुद समझ में आ जाएगा। अपने दोस्त की बात मानते हुए मैंने एक वीडियो देखना शुरू किया यह मौलाना मुझे कुछ जाने पहचाने से लगे इसलिए मैंने इनका पूरा वीडियो देखने का फैसला किया। वीडियो जैसे ही शुरू हुआ, तो सब से पहले उस में किसी फास्ट फूड का (ऐड)इश्तेहार नज़र आया जिसको एक महिला उसकी बच्ची इस टेगलाइन के साथ पेश करते नज़र आ रही थी ।
"यही आज की पसंद है, यही जिंदगी का आनंद"। ऐड पूरा होने के साथ ही मौलाना ने अपनी गुफ्तगू का आगाज़ यह फरमाते हुए किया कि हमने इस्लामी रिवायात को छोड़ दिया है। हम फास्ट फूड की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। हम जहां मौका देखते हैं वहां खड़े हो कर इस तैयार खाने को खा लेते हैं।दस्तरख्वान कितने घरों में सजाया जाता है? या हम किन इसलामी सुन्नतों के एहतमाम या एहतराम के साथ खाना खाते हैं? यह सब अब सवाल बनकर रह गए हैं। यह हमारी मा'शरत की तबाही है। अभी वह इस तबाही के दायरे को बढ़ा कर क़ौम को समझाने जा ही रहे थे कि इस्लाम ने जब शराब बंदी कि तब मुसलमानों ने अपने घरों में जमा की गई शराब नालियों में बहा दी थी,क्योंकि अल्लाह के प्यारे रसूल ने फरमाया था की शराब तमाम बुराइयों की जड़ है जो अब तुम पर हराम कर दी गई है। इसका पीना जमा करना या तिजारत करना सब हराम है, तभी एक तिजारती (कमर्शियल) ब्रेक आ गया जिसमें शराब की ऐड दिखाई जा रही थी। इसके बाद फिर मौलाना नज़र आए अब वह पहले से ज्यादा जलाल में थे और समाज में आई तमाम बुराइयों के लिए सीधे तौर पर पूरी क़ौम को कटघरे में खड़ा करके गलया रहे थे।वह पूरी कौम से पूछ रहे थे या यूं कहा जाए कि वह ऐतराज़ कर रहे थे कि समाज के द्वारा अपनाई जा रही आधुनिक जीवन शैली, कुछ नए-नए अपनाए गए रीति-रिवाज,फैशन किस तरह दीनेहक़ का हिस्सा बन गए हैं। वह जवाब तलब कर रहे थे कि यह क्या तरीका है कि हमारे नौजवानों ने अपने पजामे उतार दिए हैं और फटी हुई हाफ पेंट पहनना शुरू कर दी है। तभी उनकी तक़रीर को रोककर सोशल मीडिया द्वारा बाजार को कंट्रोल करने वाले माहिर खिलाड़ियों ने एक बड़े ब्रांड के रेडीमेड गारमेंट्स का ऐड लगा दिया जिसमें कुछ नौजवान लड़के, लड़कियां फटी हुई हाफ पेंट पहनकर मॉडलिंग करते नज़र आए। मैंने मौलाना के ब्यान को यहीं पर रोकते हुए अपने दोस्त से पूछा इसमें पैसा कहां है? यहां तो सिर्फ मज़ाक़ ही मज़ाक है।उसने कहा यह जो ऐड आप देख रहे हैं, यह हजारों और लाखों रुपए की पेमेंट मौलाना को अदा करते हैं। मैंने अपने दोस्त से पूछा इस्लाम में फोटो खिंचवाना हराम है यह बात मुझे याद है, परंतु मौलाना को याद नहीं है। उसने हंसते हुए कहा तो फिर ठीक है,तुम पीएम की तरह दाढ़ी बढ़ाओ और दाढ़ी-दाढ़ी खेल खेलते रहो और एक दूसरे से पूछते रहो कि तुम्हारी दाढ़ी मेरी दाढ़ी से ज्यादा 
सफेद कैसे?
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Tuesday, October 20, 2020

बलात्कार

यह एक सच्चाई है कि मैं समाचार पत्र नहीं पड़ता हूं, परंतु मेरे अंदर का आदमी समाचार पत्र पढ़ने का बड़ा शौकीन है। वह रोज सुबह उठकर सोसाइटी की लाइब्रेरी पहुंच जाता है, जहां वह एक दो नहीं बल्कि नगर से प्रकाशित होने वाले हर छोटे-बड़े समाचार पत्र को बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ता है। इस दिलचस्पी में भी एक खास बात यह है कि समाचार पत्र में प्रकाशित हर प्रकार की खबरें छोड़कर वह क्राइम रिपोर्ट पढ़ने में काफी रूचि दिखाता है।इन क्राइम रिपोर्ट में भी वह खासतौर पर बलात्कार से संबंधित और इनमें भी कम आयु की लड़की के साथ हुई घटना को पढ़ने में काफी रूचि दिखाता है। 
अपने अंदर के इस आदमी को मैं भली भांति पहचानता हूं, वह बड़ा बहानेबाज़ व आवारा सिफत व्यक्ति है। जिस प्रकार की छवि वह समाज को दिखाता है वैसा वह बिल्कुल नहीं है। मुझे उसकी यह आवारगी बहुत बुरी लगती है। जिसके लिए में उसको बराबर टोकता रहता हूं। मैं उसको समझाता हूं कि उसको अपनी यह बुरी आदत छोड़ देना चाहिए। एक दिन मैंने उससे कहा तुम ऐसी खबरें क्यों पढ़ते हो जो ज़हनी अयाशी पैदा करती हैं। इतना सुनकर वह भड़क गया और गुस्से में चिखते हुए कहने लगा- क्षमा कीजिए, यह सोच आपकी है जो मेरे अंदर आवारगी देखती है, मेरी नहीं है । सही सोच क्या है यह बताने का भी कष्ठ करें, मैंने उसको चिढ़ाते हुए पुनः प्रश्न किया। एक ही बलात्कार का समाचार जिस की घटना, स्थान ,तिथि, चरित्र और चरित्रों का नाम एवं आयु एक ही होती है उसी समाचार को अलग-अलग समाचार पत्रों में पढ़कर आप कौन सा शोध कार्य करते हैं ?
मेरा ऐतराज़ सुनते ही उसने तुरंत उत्तर देते हुए कहा- रिपोर्टिंग......! रिपोर्टिंग शब्द सुनकर मुझे एक प्रकार से झटका लगा और मैं अचंभित होते हुए बोला- मैं समझा नहीं, रिपोर्टिंग से तुम्हारा क्या मतलब है ? मेरे अचरज को देखते हुए वह शांति रहा और मीठे स्वर से बोला, मैं बताता हूं, कहते हुए वह मुझे समझाने वाले अंदाज में बताने लगा देखिए, आपका यह कहना ठीक है कि समाचार एक ही होता है घटना की शिकार लड़की, उसकी आयु, स्थान, क्या हुआ, कैसे हुआ अंततः हादसे की तारीख भी वही होती है,परंतु इस समाचार को लिखने वाले पत्रकार समाज के अलग-अलग वर्गो से आते हैं जिनकी कलम ही तय करती है कि खबर आम है, खास है, या बहुत खास है। उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए विस्तार से बताना आरंभ क्या। हम इस सत्य को इस प्रकार समझ सकते हैं कि एक पत्रकार किसी मासूम लड़की के साथ हुए इस शर्मनाक हादसे का समाचार को केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना, जो उसकी सोच के अनुसार रोज कहीं ना कहीं होती है बड़े सामान और सहज रूप से प्रस्तुत कर देता है। वह अपनी टिप्पणी में इस हादसे को उस लड़की या उसके परिवार की खराब किस्मत का दोष देकर अपना कर्तव्य पूरा करता है। जबकि दूसरा पत्रकार इसी घटना को कानून की बिगड़ी व्यवस्था या प्रशासन की ढ़ील बता कर सरकार के सर इलज़ाम डाल कर समाचार की जरूरतों को पूरा कर देता है। कोई तीसरा पत्रकार इस घटना को समाज के गिरते हुए स्तर की दुहाई देते हुए इंसान के वेहशीपन या पश्चिमी सभ्यता को दोषी बताकर समाचार पूरा कर देता है। कोई चौथा पत्रकार इस घटना को आंखों देखा हाल बताते हुए एक मसालेदार  पोर्न फिल्म की तरह पेश करके अपने पाठकों का मनोरंजन करता है जबकि इस भीड़ मैं से निकलकर कोई एक पत्रकार ऐसा भी होता है, जो इस घटना की पीड़ित लड़की की मानसिक, शारीरिक, सामाजिक व स्वाभिमान की पीड़ा को अपनी अंतरात्मा की गहराइयों से महसूस करते हुए समाचार इस प्रकार लिखता है जैसे वह पत्रकार ना होकर स्वयं एक पीड़ित लड़की हो और जो अपने ऊपर हुए इस जुल्म को सहन करते हुए सारा ज़हर खुद ही पी जाना चाहती हो बिल्कुल वैसे ही जैसे एक सच्चा गायक किसी दर्द भरे गाने को अपने गले या पेट से ना गाकर दिल की गहराइयों से गाता है और हमारे मन मस्तिष्क पर अपनी छाप हमेशा हमेशा के लिए छोड़ जाता है।
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शाहिद हसन शाहिद
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Saturday, October 10, 2020

कूड़ेदान

मैंने अपनी आंतों को पेट के अंदर इतना सिकरोड़ा कि वहां एक गड्ढा सा बन गया। फिर मैंने अपने पैरों को इस गड्ढे में फिट किया और पंजों के बल बैठ गया। इस प्रकार पंजों के बल उकड़ू बैठकर भूख पर विजय प्राप्त करना एक ऐसी प्राचीन कला है, जो पूरे विश्व के गरीबों में प्रचलित है।भूखे पेट की सहायता से मैंने इस कला पर बचपन में ही विजय प्राप्त कर ली थी। मेरा अनुभव कहता है कि इस प्रकार बैठने के बाद इंसान की सोई हुई ऐसी बहुत सी अंतरात्माएं जाग जाती हैं, जो फूले हुए पेट के साथ कभी नहीं जागतीं। आनंद देने वाले इस योग मुद्रा में बैठने के बाद मेरी अंतरात्मा ने देखा- मेरे चारों ओर खाने के बर्तन बिखरे पड़े हैं। जिनमें कुछ टूटे-फूटे हैं और कुछ ठीक-ठाक हैं। जो ठीक-ठाक हैं उन में अन्न का दाना नहीं है। वे खाली हैं मेरे पेट की तरह। 
मैं हैरानो-परेशान अभी इन बर्तनों को देख ही रहा था तभी मेरी नज़र उस कूड़ेदान की ओर चली गई,जहां कुछ दिन पहले तक शहर के सभ्य व सम्मानित लोग अपने मरे हुए कुत्ते, बिल्ली,घर का बेकार सामान और कन्या भ्रूण फेंक जाते थे,यह मेरे हुए शरीर सढ़ कर इतनी गंध पैदा करते थे कि आसपास के निवासियों का जीवन नर्कमय हो चुका था।
इस गंध ने मेरी नाक के नथुनों में जाकर मुझे कभी दुखी नहीं किया,कारण यह था कि इस गंध से कहीं अधिक गंध मेरी उस पेंट और शर्ट से आती थी,जो मैंने जवान होते ही इसी कूड़ेदान से उठाकर 60 वर्ष पहले पहन ली थी, और दूसरा कारण था कि मैं ना तो समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति हूं और ना ही सभ्य समाज का अंग जिसको गंध या सुगंध का अंतर मालूम हो।
कूड़ेदान को देखकर मेरे मन में एक पुरानी कहावत याद आने लगी कि 20 साल बाद कूड़ेदान के भी भाग्य बदल जाते हैं, यह कहावत अब मुझे सत्य होती प्रतीत हो रही थी। सामने वाले कूड़ेदान का भाग्य निसंदेह अब बदल चुका है। वह पहले से कहीं ज्यादा उदार एवं प्रगतिशील नजर आने लगा है। नगर के सम्मानित लोग अब इस कूड़ेदान पर अपने मरे हुए चूहे बिल्ली नहीं फेंकते, जो सड़कर उनका जीवन को नर्क बनाते थे, बल्कि वे अब कूड़ेदान को साफ-सुथरा एवं स्वच्छत रखते हुए करोना महामारी की संभावना से ग्रस्त अपने जीवित बुज़ुर्ग,बीमार माता-पिता व रिश्तेदारों को फेंक जाते हैं। जिनको कुछ समय बाद कारपोरेशन की गाड़ीयां कूड़े करकट की तरह उठाकर ले जाती हैं । गाड़ीयां जब इन जीवित रिश्तों को उठाकर ले जाती है तो यह रिश्तेदार उनको दूर खड़े होकर हाथ जोड़कर पूरे धार्मिक रीति रिवाज के साथ रुखसत होते हुए अपने घरों की बाल्कोनियों से देखते रहते हैं। इन में से कुछ लोग थाली या ताली बजाकर करोना योद्धाओं के प्रति अपना स्नेह एवं आदर सम्मान भी प्रकट करते हैं।
मेरी समस्या यह नहीं है के रिश्तेदारों ने अपने जीवित परिवारजन को कूड़ेदान पर फेंक दिया। समस्या यह भी नहीं है कि उन्होंने थाली और ताली क्यों बजाई? मेरी समस्या केवल इतनी है कि जो बदबूदार पैंट-कमीज मैंने 60 वर्ष पहले कूड़ेदान से उठाकर पहनी थी उसको उतारने के लिए कब, कौन और कहां से आएगा?
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शाहिद हसन शाहिद
70093-16991
I wrinkled my intestines so much inside the stomach that it became a hole there. Then I fitted my feet in this pit and sat on the feet. In this way, conquering hunger by sitting squatting is such an ancient art, which is prevalent among the poor all over the world. With the help of a hungry stomach, I conquered this art in my childhood. My experience says that after sitting in this way, many such sleeping souls wake up, which never wake up with bloated stomach. After sitting in this yoga post that gave pleasure, my conscience noticed - the food utensils are scattered all around me. Some of them are broken and some are fine. Those who are well-off do not have food grains. They are empty like my stomach.
 I was surprised to see these utensils right now, when my eyes went to the dustbin, where till a few days ago the civilized and respected people of the city used to throw their dead dogs, cats, household waste and female embryos , This used to make my body smell so bad that the lives of the nearby residents had become hellish.
 This smell never made me sad by going into the nostrils of my nose, the reason was that more than this smell came from my paint and shirt, which I had worn 60 years before when I was young, from this dustbin. And the second reason was that I am neither an eminent person of society nor a part of a civilized society who knows the difference of smell or fragrance.
 Seeing the dustbin, I started remembering an old saying that after 20 years, the fate of dustbin also changes, I now seemed to be true. The fate of the front dustbin has undoubtedly changed now. He is beginning to appear more liberal and progressive than ever before. The respected people of the city no longer throw their dead rat cats on this dustbin, which made their lives hell by rotting, but they now keep their dustbins clean and hygienic, with their surviving elderly, sick mother, prone to the Karona epidemic. Father and relatives are thrown away. After some time, the Corporation's cars are taken away like garbage. When the vehicles carry these living relations, these relatives stand away from them and fold their hands and watch them from the balconies of their homes, moving with full religious rituals. Some of these people also express their affection and respect for Karona warriors by playing thali or tali.
 My problem is not that relatives throw their surviving family on the trash. The problem is not also why they played the thali and clap? My only problem is that when, who and where will I come to remove the smelly pant-shirt that I wore from the dustbin 60 years ago?

Thursday, October 1, 2020

ड्रामेबाज़

आयु की ढलान पर खड़े उस व्यक्ति के बारे में विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता था कि वह वास्तव में पागल है या भविष्य के भावी खतरों से डरा हुआ एक आम व्यक्ति है। वेशभूषा देखकर भी उसको पागल नहीं कहा जा सकता था, जबकि बातें वह पागलों जैसे ही कर रहा था। सड़क किनारे खड़े होकर वह चीख-चीख कर कह रहा था- लोगों सुनों, मेरे बालों में जुंए रहती हैं। फिर कहता-नहीं वे जुंए नहीं हैं,घुसपैठिए हैं, फिर तुरंत ही कहता- घुसपैठिए भी नहीं हैं, वे आतंकी हैं। आतंकवाद से हम सबको लड़ना होगा। इतना कहकर वह नारे लगाने लगा,आतंकवाद जिंदाबाद,
आतंकवाद मुर्दाबाद। फिर कुछ रुक कर कहने लगा,आतंकवाद का मुझे सर तोड़ना है। यह कहते हुए उसने अपने सर के बाल नोचने आरंभ कर दिए। फिर लोगों को अपने हाथों की उंगलियों में फंसे दो चार बाल दिखा कर कहने लगा- देखो-देखो....! घुसपैठियों ने मेरे बाल तोड़ दिए। वे जालिम हैं। फिर टूटे बालों का दुःख मनाते हुए जोर-जोर से चीख-चीख कर रोते हुए कहने लगा- एक-एक करके मेरे बाल तोड़े जा रहे हैं। फिर एक ही पल में खुश होकर कहने लगा- हा हा हा...! मैं जल्द ही गंजा हो जाऊंगा, तब बड़ा मज़ा आएगा, अपने सर पर तबला बजाऊंगा, फिर लोगों की भीड़ से पूछने लगा- तुम मज़ा देखोगे, तबला सुनोगे ? अपनी हर बात को तीन बार कहना उसकी आदत थी। 3 बार कह कर वह समझ लेता था कि लोगों ने कह दिया है कि हम देख रहे हैं या हम देखेंगे या हम मज़ा लेंगे।
इस प्रकार की जुमले बाजी वह बहुत समय से कर रहा था। उसके चारों तरफ खड़े लोग मजा ले रहे थे। लोगों को उसके जुमले बहुत पसंद थे। कुछ न्यूज़ चैनल भी उस पर फिदा थे, वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उसको कवर करते रहते थे। एक कैमरे की ओर मुंह करके पागल चीखते हुए बोला- घुसपैठियों....! सुन लो, तुम्हारी साजिशें सफल नहीं होने दूंगा। सर के सारे बाल नोच दूंगा पर तुमको अपने सर पर राज नहीं करने दूंगा। एक-एक घुसपैठिए को बाहर निकाल कर दम लूंगा, कहकर वह अपने उन रेशमी बालों को एक बार फिर नोचने लगा जिन को प्राकृतिक ने उसके सर पर बड़ी सुंदरता वह सजगता से सजाए थे,जो पहली नज़र में देखने से लगते थे कि भिन्न-भिन्न प्रकार के फूलों को मिलाकर एक गुलदस्ता बनाया गया है और फिर उसके सर पर सजा दिया गया हो। यह सजावट बड़ी आकृर्षित व मनमोहक थी पर उसके मन में यह बात घर कर गई थी कि उसके सुंदर बालों में कुछ गड़बड़ अवश्य है। इस गड़बड़ को ही वह विनाशकारी जुएं कह रहा था और डरा हुआ था।
लोगों ने उसको चीखते चिल्लाते देखा। स्वयं को चोट पहुंचाते देखा,परंतु कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, किसी प्रकार की कोई दया भी उसके प्रति नहीं दिखाई। एक पागल के लिए लोगों में सहानुभूति या दया कम ही होती है, तभी कहानी मैं एक नया मोड़ आया और लोगों की भीड़ में से कुछ महिलाएं उसकी और बढ़ीं और बगैर किसी डर के उसको घेरकर बैठ गयीं। उन में से बुजुर्ग महिलाओं ने पागल के सर को अपनी आगोश में रखा और उसकी जुंए तलाश करने में व्यस्त हो गयीं। कुछ क्षण बाद पागल एक मासूम बच्चे की तरह इन शक्तिशाली महिलाओं की गोद में शांत हो गया पर अचानक दूर खड़ी एक पत्रकार जो इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रही थी वह बेहोश होकर जमीन पर गिर गई। इस रहस्य को मैं आज तक नहीं समझ सका कि बुजुर्ग महिलाओं द्वारा एक पागल को शांत करने पर किसी चैनल की  पत्रकार क्यों ढेर हो गई?
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शाहिद हसन शाहिद
70093-16991
The person standing on the slope of age could not be said with confidence that he is indeed insane or a common man scared of future threats. Even seeing the costumes, he could not be called crazy, while he was talking like crazy.
 He was standing on the roadside screaming and screaming, "People listen, lice are in my hair." Then he says no, he is not a lice, he is not an intruder, then he immediately says - he is not an intruder but he is a terrorist. We all have to fight terrorism. Saying this, he started shouting slogans,
 Terrorism Zindabad, Terrorism Murdabad. Then something stopped and said, I have to break the head of terrorism. Saying this, he started scratching his hair. Then people showed two hairs stuck in the fingers of their hands and started saying - Look, look…! The intruders broke my hair. They are bloodthirsty. Then, while celebrating the broken hair, I started crying loudly and crying - one by one my hair is being broken. Then in an instant, he started saying happy - ha ha ha ...! I will be bald soon, then it will be great fun,
 I would play tabla on my head, then started asking the crowd of people - will you see the fun, will you listen to the tabla? It was his habit to say his words three times. He used to understand by saying 3 times that people have said that we are watching or we will see or we will enjoy.
 He had been doing this kind of play for a long time. People standing around him were enjoying. People loved her jumla. Some news channels were also attracted to him, he said while warning- Intruders….! Listen, your intrigues will not succeed. Will scrape off all the hairs of the head but will not let you rule your head. I would pull out every single intruder, saying that he again scratched his silky hair, which the natural had decorated with great beauty on his head, which at first glance seemed to be different A bouquet of flowers has been made and then decorated on its head. This decoration was very attractive and adorable but it was said in her mind that there is something wrong with her beautiful hair. He was calling this mess a destructive lice and was scared.
 People saw him screaming. He was seen hurting himself, but showed no reaction, no kindness towards him. People have little sympathy or compassion for a lunatic, then a new twist came in the story and some of the women in the crowd of people grew more and sat around him without any fear. The elderly women among them kept the madman's head in their arms and got busy searching for his lice. Moments later, like an innocent child, the insane woman calmed down in the lap of these powerful women, but suddenly a journalist standing far away capturing the scene with her camera fell unconscious to the ground. I could not understand this mystery till today why journalists piled up like a TRP of a channel when an elderly woman pacified a lunatic?
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 Shahid hasan shahid
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