Saturday, January 30, 2021

मासूम पोती


टेलीविजन पर पूरे दिन बलात्कार की खबरें और उनपर पर होने वाली डिबेट सुनते सुनते जब मैं थक गया,तो खुद को तरोताज़ा करने के लिए आंखें बंद करके आराम से सोफे पर पैर फैला कर बैठ कर सोचने लगा कि बाज़ार वाद के बढ़ते प्रभाव और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप ने हमको यह किस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है कि कल तक जिस कन्या को हम देवी की तरह पूजा करते थे, जिस को हम घर की लक्ष्मी कहते थे,जो महिला परिवार की इज़्ज़त व आबरू हुआ करती थी, जिसके कदमों के नीचे बच्चे अपनी जन्नत तलाश करते थे,आज उसी देवी को लोगों ने अपनी हवस की पूर्ती की वस्तु विशेष और प्रयोग करके फेंकने वाला नेपकिन बना दिया है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हमारा नेशनल मीडिया बलात्कार से संबंधी समाचार देश के कोने-कोने से ढूंढ ढूंढ कर क्यों लाता है? फिर उस समाचार को डिबेट के माध्यम से चटकारेदार बनाकर उसमें धार्मिक,राजनीतिक एवं विपक्ष को घेरने के पहलू तलाश करने या किसी एक जाति विशेष के साथ जोड़ कर नेशनल लेवल पर इस प्रकार परोसता है, जैसे यह कोई क्राइम ना होकर देश के विरुद्ध सोचा समझा रचा गया षड्यंत्र हो। नेशनल टीवी द्वारा इस गैर जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग के बारे अभी मैं विचार कर ही रहा था कि मेरी पोती जो 6 वर्ष की है मेरे पास आई और मुझे झंझोड़ते हुए कहने लगी- दादू आप सो रहे हैं? मैंने अपनी आंखें खोलते हुए कहा-
 बेटा मैं तो जग रहा हूं। उसने कहा- मुझे आपसे कुछ पूछना है।मैंने उसको प्यार से गोद में बैठाते हुए बड़े स्नेह भरे अंदाज में पूछा- मेरे बेटे को दादू से क्या पूछना है पूछो।उसने बड़ी मासूमियत से शिकायती अंदाज में कहा- दादू...! मुझे कोई नहीं बता रहा है कि "बलात्कार" क्या होता है।मैं समझ गया कि निरंतर चलने वाले टीवी समाचारों में यह शब्द वह बार-बार सुन रही है,जबकि उसको अभी पूरी तरह भाषा का ज्ञान नहीं है, इस कारण उसकी भाषा सीखने की जिज्ञासा जाग गई है और वह बलात्कार शब्द का अर्थ समझना चाहती है परंतुु मेरे सामने उसका यह प्रश्न एक नाग की तरह फन फैलाए खड़ा था कि मैं इस मासूम को किन शब्दों में बताऊं कि बलात्कार क्या होता है।मैंने उसकी आयु और भोलेपन को देखते हुए उसको यह बताना ही उचित समझा कि मैं उस से यह कहूं कि बेटा यह एक प्रकार का बुखार होता है जो केवल महिलाओं को दुखी करता है। यह कहकर मैंने बच्ची को तो बहला दिया; परन्तु मैं अंदर से डर गया। मुझे डर इस बात का था कि भविष्य में जब कभी इसको बुखार आ गया तो यह पूरे मोहल्ले में शोर मचा देगी कि मेरा बलात्कार हो गया है। अभी मैं अपने इस अनजाने डर से उभर भी नहीं पाया था कि उसने एक और प्रश्न मुझसे पूछ लिया। दादू...! बलात्कारी कौन होता है?पहला गलत उत्तर देकर मैं बुरी तरह फंस चुका था, इसलिए मैंने दूसरा झूठ बोला और कहा- जिस मच्छर के काटने से बुखार आता है उसको बलात्कारी कहा जाता है।अब मैं समझ चुका था कि देश के दूरदराज़ गांव में किसी बच्ची के साथ हुए बलात्कार और बर्बर हत्या पर पूरे दिन चलने वाली मीडिया ट्रायल को सुनकर उसका मासूम ज़हन बहुत से प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए बेचैन है। मेरे उत्तर से पोती संतुष्ट नहीं थी। उसने तर्क देते हुए मुझे से फिर पूछा- दादू मम्मा तो जब मच्छर मारने की क्रीम हमको लगाती है तो कहती है कि इसके लगाने से मच्छर मर जाते हैं। मैंने टीवी में अभी-अभी देखा है कि लोग चीख चीख कर कह रहे थे कि बलात्कारी को फांसी दो।दादू...! मच्छर तो क्रीम लगाने से मर जाता है, तो उसको फांसी क्यों दी जाए? पोती के श्रंखला वद सवालों में से इस सवाल का मैं कोई उत्तर नहीं दे सका। बल्कि एक झटके के साथ सोफे से खड़ा हो गया और चीख़ते हुए परिवार वालों से कहा- सब लोग कान खोल कर सुन लो,आज के बाद कोई व्यक्ति टीवी पर बलात्कार से संबंधी समाचार या डिबेट नहीं सुनेगा। भारत पूछता है तो पूछता रहे, हर सवाल का जवाब देना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। यह कहते हुए मैंने घरवालों पर समाचार ना सुनने का फरमान जारी करते हुए उन पर ख़बरें ना सुनने का प्रतिबंध लगा दिया। यथार्थ का शायद यही सच है। इससे अधिक मैं या आप कुछ नहीं कर सकते। टीवी द्वारा खेले जा रहे टीआरपी के खेल के सामने हम और आप सब बोने जो साबित हो रहे हैं।  *****
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धन्यवाद सहित
शाहिद हसन शाहिद
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Wednesday, January 20, 2021

कहानी मछली की

सोशल मीडिया से होती हुई एक सूचना जैसे ही समाचार पत्रों की सुर्खियों तक पहुंची कि एक मछली के पेट पर पीले रंग से लिखा शब्द "अल्लाह" साफ तौर पर पढ़ा जा सकता है, तो लोगों की सोई हुई आस्था एकदम जाग उठी और लोग दूर-दूर से इस अनोखी मछली को देखने के लिए उस जगह पहुंचने लगे जहां यह अद्भुत मछली अपनी भरपूर शानो शौकत के साथ एक छद्म तालाब जिसको इकोरियम कहा जाता है उस में तैर रही थी।

मैं जब वहां पहुंचा तो इकोरियम के आसपास लोगों की काफी भीड़ जमा थी, जो मछली को बड़े आदर और सम्मान के साथ देख रही थी। उनमें से कुछ श्रद्धालु आंखें बंद करके दिल ही दिल में उस मछली का आशीर्वाद प्राप्त करने और अपनी मनोकामना पूरी करने की अरदास कर रहे थे। कुछ शांत स्वभाव के साथ उसके दर्शन करके स्वयं को भाग्यशाली समझ रहे थे। वहां मोजूद कुछ धनवान ऐसे भी थे जो इस अद्भुत चमत्कार की बोली लगाकर उसको खरीदना चाहते थे, वे जानते थे कि मछली एक मध्यवर्गीय परिवार की संपत्ति है जिसको वह कुछ रुपए खर्च करके आसानी से खरीद कर अपने ड्राइंग रूम की शोभा और समाज में अपना गौरव बढ़ा सकते हैं। जो लोग इस मछली को खरीदने की क्षमता नहीं रखते थे वह दूर खड़े होकर कह रहे थे कि हमारे तो दिल में "अल्लाह" बसता है, हम तो क़ुदरत के इस करिश्मे को देखने आए हैं। कुछ ऐसे भी थे जो इकोरियम के शीशे पर इत्र (खुशबू) लगाने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ लोग दूर खड़े होकर धूप अगरबत्ती जलाकर रूहानी वातावरण बना कर अपनी श्रद्घा पेश कर रहे थे। धार्मिक विद्वान भी वहां मौजूद थे जो लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि हमें क़ुदरत के इशारे पर गौर करना चाहिए जो हमको याद दिला रहा है कि दुनिया की हर चीज़ का मालिको मुख्तार अल्लाह है। जबकि कुछ ऐसे भी थे जिनका कहना था यहां जो कुछ भी हो रहा है यह सब पाखंड है जिसको दूसरे शब्दों में बिद'त कहा जाता है।अल्लाह हम सबको इस गुनाहे अज़ीम से महफूज रखे। (इस्लाम जिन चीजों की इजाज़त नहीं देता है वे बिद'त कहलाती हैं।)

इन सब से अलग मैं यह सोच रहा था कि मछली के पेट पर नज़र आने वाला लफ्ज़ "अल्लाह" जीव रसायन की एक प्रक्रिया है, जो कभी भी डिलीट हो सकती है; परंतु जो डिलीट नहीं हो सकता है वह हमेशा रहने वाला नाम "अल्लाह" है जि‌को हम अपने ज़हन की किसी डिस्क में सेव करके भूल चुके हैं। विचारों के इस भंवर में डुबकी लगाते हुए मैंने देखा कि कुछ पत्रकार अपने कैमरों से उस नींबू मिर्ची के टोटके को कवर कर रहे हैं, जो कुछ समय पहले तक वहां नहीं था; परंतु अब वह उस ड्राइंग रूम के द्वार पर एक पहरेदार की तरह लटक रहा था जहां वह अद्भुत मछली लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनी हुई थी। तभी मेरा ध्यान उस महिला पत्रकार पर गया जो लाइव रिपोर्टिंग करते हुए अपने दर्शकों को बता रही थी कि इस अनोखी जलपरी ने लोगों में आस्था कि वह ज्योत जगा दी है जो इससे पहले अतीत में राम मंदिर अभियान के समय देखी गई थी। लोग इस जलपरी को भगवान का अवतार मान रहे हैं। उन्होंने उसकी विधिवत तौर पर पूजा-अर्चना भी शुरू कर दी है। जलपरी को कोई हानि न पहुंचे इसके भी पुख्ता प्रबंध कर लिए गए हैं, जहां यह जलपरी विराजमान है वहां नींबू मिर्ची लटका दिया गया है और लोगों से कहा जा रहा है कि वह जलपरी के आसन से दूरी बनाकर रखें।उसको छूने या किसी प्रकार की हानि पहुंचाने की कोशिश ना करें। जलपरी देश की धरोहर है। इसने भारत में प्रकट होकर पड़ोसी देश को जता दिया है कि अब उनका एकमात्र सहारा "अल्लाह" भी उनके साथ नहीं है। अंगारों की शैय्या पर लौटने वाला पड़ोसी देश इस देव्या चमत्कार से बुरी तरह बौखला गया है। वह इस सच्चाई को पचा नहीं पा रहा है कि "अल्लाह" ने उसका साथ छोड़ कर उस देश को क्यों चुना है जहां कण-कण में राम बसते हैं। अपनी जनता का ध्यान अपनी नाकामियों पर से हटाने के लिए वह कोई भी नापाक हरकत कभी भी कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो हम उस को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं। हम उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। उसको याद रखना होगा कि 130 करोड़ भारतीयों के साथ अब उस जलपरी की भी अपार शक्ति हमको प्राप्त है जिस पर खुद भगवान ने अपने हस्ताक्षर करे हैं।

लाइव टेलीकास्ट होने वाली इस रिपोर्ट ने मुझे व्याकुल कर दिया और उत्तेजित भी। मैं समझ नहीं सका कि यह किस प्रकार कि रिपोर्टिंग हो रही है तभी मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा और मैंने उस रिपोर्टर को इशारे से एक ओर बुलाकर कहा- यह क्या कर रही हो? उसने कहा- अपनी जॉब कर रही हूं कोई आपत्ति है।
मैंने कहा- हां...! आपत्ति है, एक जिम्मेदार वरिष्ठ नागरिक और पत्रकार होने के नाते मैं पूछना चाहूंगा कि यह तुम किस प्रकार की रिपोर्टिंग कर रही हो? एक साधारण सी बात को तुमने असाधारण बनाते हुए पहले तो उसका ध्रवीकरण किया और अब दो देशों को जंंग के मुहाने पर खड़ा करने का दुस्साहस कर रही हो, तुम जानती हो जंग.... अभी मैं इतना ही कह पाया था कि उसने कहा- मुझे मेरा काम करने दीजिए। 
यह कहते हुए वह मेरे पास से चली गई और मछली को फोकस करते हुए लोगों को एकबार फिर बताने लगी, आप अद्भुत चमत्कार को देख सकते हैं कि कुछ समय पहले जलपरी पर जो शब्द पीले रंग से लिखा दिख रहा था अब उसका रंग हल्के हल्के केसरी होता जा रहा है। 

पत्रकारिता के इस अंदाज को मैं क्या नाम दूं यह मेरी समझ से परे था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह किस प्रकार की पत्रकारिता है? सवालों के इस मकड़ जाल ने मुझे एक भावहीन स्तंभ बना दिया था, जिसमें से केवल एक ही आवाज़ मुझे गूंजती सुनाई दे रही थी कि यह युवती जब अपने घर परिवार के लिए भोजन बनाती होगी तो वह कितना स्वादिष्ट होता होगा। मज़ेदार, चटखारेदार बिल्कुल इस समाचार की तरह।
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शाहिद हसन शाहिद
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Sunday, January 10, 2021

फेसला देश का

मैं सुबह 5:00 बजे जब घर से सैर करने के लिए निकला तो धुंध इतनी अधिक थी कि हाथ को हाथ नज़र नहीं आ रहा था कुछ अंधेरा भी था। आजकल सूर्य उदय सुबह 7:00 बजे के बाद हो रहा था। अंधेरे और धुंध से लड़ता हुआ जब मैं गार्डन की ओर बढ़ा जा रहा था तब मैंने देखा कि कुछ लोग तेज़-तेज़ क़दमों के साथ वापिस घर की ओर दौड़े जा रहे हैं, इन भागने वालों में खास बात यह थी कि सब के हाथों में शराब की बोतलें थीं, इनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके दोनों हाथों और कोट की जेब में भी बोतलें नज़र आ रही थीं। मुझे बड़ी हैरानी हुई कि इतनी सुबह यह लोग इतनी बड़ी संख्या में शराब कहां से ला रहे हैं। तभी मैंने देखा कि उनमें से एक व्यक्ति ने अपने एक साथी को रोक कर उसके कान में कुछ कहा तो वह व्यक्ति भी तेज़ी के साथ सड़क की दूसरी ओर दौड़ने लगा। मैंने दौड़ते हुए उस व्यक्ति को रोकते हुए पूछा- भाई क्या हुआ कहां भागे जा रहे हो? उसने कहा कि हाईवे पर एक्सीडेंट हो गया है वहीं जा रहा हूं। एक्सीडेंट का सुनकर मैं भी स्वयं को रोक नहीं सका और दौड़ाता हुआ हादसे की जगह पहुंच गया। वहां पहुंच कर मैंने देखा कि एक व्यक्ति जो कार चला रहा था वह  
जख्मी अवस्था में ड्राइवर की सीट पर बेहोश पड़ा है। जबकि उसकी कार के चारों पहिये गायब हैं और वह ईंटों से बने प्लेटफार्म पर खड़ी है। मैं कार के जब और ज्यादा करीब पहुंचा तो मैंने देखा कि उसकी ऐसिसरीज़ भी गायब हैं और कार के चारों तरफ शराब की पेटियों के खाली डिब्बे बिखरे पड़े हैं। मैंने जब जख्मी का मुआयना किया तो उसको जीवित पाया। करीब ही एक व्यक्ति को उल्टी करते देखा शायद उसने अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति को इतना जख्मी देखा होगा। कुछ लोग इस हादसे पर अपनी प्रतिक्रिया यह कहते हुए भी सुने गए कि यार सुबह- सुबह मूड खराब हो गया। घायल की स्थिति कुछ ऐसी थी कि उसको अकेले कार से नहीं निकाला जा सकता था। मैंने आगे बढ़ कर लोगों से कहा- आप लोग क्या देख रहे हैं? कुछ लोग मिलकर घायल को निकालते क्यों नहीं यह अभी जिंदा है। मेरी बात सुनकर कुछ लोग यह कहते हुए वहां से खिसक गए कि हम पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते, सब कुछ तो लोग लूट कर ले गए हैं हम कहां तक जवाब देते फिरेंगे। मैं अकेला उसकी जिंदगी बचाने में असमर्थ था इसलिए मैंने बगैर देर किए लगभग सुबह 6:00 बजे पुलिस को फोन किया और हादसे का पूरा विवरण उनको बताया और यह भी बताया की एक्सीडेंट सड़क किनारे खड़े एक ट्रक से टकरा जाने से हुआ है जो अनुमानुसार लगभग सुबह 4:00 बजे हुआ होगा। मैंने पुलिस को यह भी बताया कि एक व्यक्ति बुरी तरह घायल है जो अभी जिंदा है जिसको फोरी मेडिकल ऐड द्वारा बचाया जा सकता है। मेरी सूचना प्राप्त होने के दो घंटे बाद 13 किलोमीटर का सफर तय करके मुक़ामी पुलिस लगभग 9:00 बजे घटनास्थल पर पहुंची। जरूरी कार्रवाई करने के बाद जब पुलिस 16 किलोमीटर दूर उस घायल को अस्पताल लेकर पहुंची तो उस समय तक घायल दम तोड़ चुका था।
मैं और कुछ लोग पुलिस के साथ सहानुभूति के तौर पर अस्पताल तक गए। पुलिस ने हमारे सामने जब मृतक की तलाशी ली तो उसका पर्स, मोबाइल, हाथ की घड़ी या कोई भी पहचान पत्र ऐसा नहीं मिला जिससे उसकी पहचान हो जाती, तभी साथ गए किसी व्यक्ति ने कहा कि घायल के कपड़े बता रहे हैं कि वह शराब का तस्कर होगा उसकी बात का बाकी लोगों ने भी समर्थन किया फिर उसने अपनी बात पर मोहर लगाते हुए कहा कि ऐसे देशद्रोही का यही अंजाम होना चाहिए।
कपड़ों से हुई इस पहचान और फेसले को सुनकर मैं अपना सर पकड़कर बैठ गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे देश को यह क्या हो गया है कि लोग कपड़ों से लोगों को पहचान कर फेसले भी लेने लगे हैं। मेरे दिल में अचानक यह ख्याल आया कि जंगल राज में ऐसा ही होता है। कोई एक बहुबली जंगल का शेर बनकर शिकार करता है फिर उस मरे हुए शिकार को जंगल के दूसरे कमज़ोर जानवर दावत समझकर चट कर जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ है। धुंध ने एक इंसान को मार दिया और लोगों ने मरते हुए इंसान की परवाह नहीं की बल्कि उसकी कार का सारा सामान और उसके मालिक को भी लूट लिया। अब मरने वाले के कपड़े देखकर फेसला सुना रहे हैं कि मरने वाला अपने कपड़ों से तस्कर लगता है इसलिए ऐसे लोगों का यही अंजाम होना चाहिए। इन लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर कोई सवाल नहीं खड़े किए और ना ही उन लूटने वालों लोगों की भूमिका पर कुछ कहा जो एक जख्मी को लूट कर जश्न मना रहे थेे बल्कि मरनेे वाले को मुजरिम साबित करके उसके खिलाफ फेसला सुनाने का हौसला दिखा रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इनको कौन भ्रमित कर रहा है। वह कौन फक़ीर है जो लोगों को कपड़ों से पहचानने का यह चमत्कारी मंत्र इनको सिखा रहा है।
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शाहिद हसन शाहिद
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Wednesday, December 30, 2020

नाम नहीं बताऊंगा

मुझे आज जिस व्यक्ति का इंटरव्यू करना था वह अपनी वेशभूषा से किसान लग रहा था और मेरे स्टूडियो में उसी लापरवाही से बैठा था जैसा कि कुछ समय पहले वह धरना स्थल पर अपनी ट्रेक्टर ट्राली में बैठे था। स्टूडियो मैं लगे कैमरों से वह डरा हुआ नहीं था बल्कि मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह कैमरों को डराते हुए कह रहा हो कि अब मैं तुमको बताऊंगा कि मैं कौन हूं।
मेरा अनुभव कहता है कि आजकल मध्यवर्ग में क्रोध का स्तर कुछ अधिक बढ़ा हुआ है। उसको सरकार से इतनी शिकायतें हैं कि ज़रा सी बात पर यह वर्ग उग्र हो जाता है।  यही मध्यवर्ग आजकल किसानों की शक्ल में संघर्ष करते हुए सड़कों पर है। जितना क्रोध इस समय इस वर्ग में है उतना गरीबी की रेखा से नीचे जीवन जीने वाले गरीबों या अमीरों में नजर नहीं आता।
मैंने उस व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक कई बार देखा मुझे ऐसा लगा कि यह एक व्यक्ति ना होकर स्वयं मुकम्मल आंदोलन है, जो मेरे प्रश्न पूछते ही फट जाएगा और पल भर में सरकार विरोधी शिकायतों की फेहरिस्त खोल कर रख देगा। मैंने इंटरव्यू आरंभ करते हुए उससे पूछा- तुम्हारा नाम क्या है।
उसने मेरे शक को सही साबित करते हुए एक प्रकार से फटते हुए मुझसे ही प्रश्न कर दिया- क्या मेरी बेइज्जती करने के लिए बुलाया है?
मैंने अपने लेहजे में नरमी बरतते हुए कहा- नाम पूछना बेज्जती नहीं होती है। इंटरव्यू का नियम होता है कि इंटरव्यू देने वाले का नाम पूछा जाए। तुम अपना नाम बताओ ताकि हमारे दर्शकों को मालूम हो सके कि वह किसकी बात सुन रहे हैं।
उसने कहा- मैं अपना नाम सर्वजनिक नहीं करना चाहता इस कारण नाम नहीं बताऊंगा।
संवाद को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा- ऐसा क्या है तुम्हारे नाम में जो तुम सर्वजनिक नहीं करना चाहते। तुम इस समय नेशनल चैनल पर हो, करोड़ों लोग तुम्हारा नाम जानना चाहते हैं। पर मैं करोड़ों लोगों को अपना नाम नहीं बताना चाहता, उसने साफ शब्दों में कहा।
मैंने पूछा- इसका कारण?
उसने कहा-मेरी पहचान किसान है जो नाम बताते ही समाप्त हो जाएगी।
नाम से किसानियत का क्या संबंध है, मैं समझा नहीं। उसने कहा-बहुत गहरा संबंध है,आप अपना इंटरव्यू शुरू कीजिए।
यह समस्या तो बड़ी गंभीर है मैंने एक बार फिर कौशिश की। उसने कहा-ऐसा ही समझ लीजिए। मैंने संवाद जारी रखते हुए अपने चर्चित पत्रिकाना अंदाज में कहा-मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारा नाम मुगल कालीन की याद दिलानेे वाला है ?
उसने प्रश्न का उत्तर ना देते हुए केवल इतना कहा कि जब मैं अपना नाम बताऊंगा तो परेशानी मेरे लिए कम तुम्हारे लिए ज्यादा खड़ी हो जाएगी।
मैंने चौंकते हुए उससे पूछा ऐसा क्यों?
उसने कहा-मान लो अगर मैंने अपना नाम तुम्हारी अटकलों के अनुसार मुगलकालीन युग से संबंधित बता दिया तो तुम असल मुद्दों से भटक कर मेरा नाम बदलने, मेरी घर वापसी या मेरे नाम के पीछे पाकिस्तान या चायना को तलाश करने लग जाओगे, जैसा कि भविष्य के अनुभव कहते हैं और वैसे भी तुम्हें मेरे नाम से क्या लेना देना है तुमने तो स्वयं मेरा नाम अन्नदाता रखा था फिर अचानक ही तुमने मुझे इतने नाम दे दिए कि मैं स्वयं कंफ्यूज हूं कि मैं स्वयं को टुकड़े टुकड़े गैंग कहूं, अर्बन नक्सल कहूं, दलाल, राजद्रोही, आतंकवादी, खालिस्तानी कहूं। इन सबके अतिरिक्त आलसी, निठल्ले, बहके हुए लोग कहते हुए पिछले एक माह से तुम्हारी जुबान नहीं थकी है। लोगों ने अपने भाषणों में या अपने ट्वीट द्वारा मुझे इन नामों से केवल एक बार ही बदनाम किया होगा जबकि तुम्हारे चैनल 24 घंटे मैं कई हजार बार इन नामों के सहारे कभी मेरे संघर्ष पर घड़ियाली आंसू बहाकर तो कभी मेरे मान सम्मान पर सिधा हमला करके मुझे रूसवा कर रहे हैं। अब तुम मुझे किसी भी नाम से पुकारो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर उसने एक गहरी सांस ली और थोड़ा रुक कर बोला मुझसे तुम किसी नए नाम की उम्मीद क्यों रखते हो। मैं नहीं चाहता कि इस संघर्ष के गर्भ से जन्म लेने वाली आवाज़ के चेहरे पर एक नए नाम का टेग अभी से लगा दिया जाए, ताकि तुम उसको पंजाब, हरियाणा, यूपी, महाराष्ट्र या हिंदू, मुसलमान,सिख, ईसाई और जातियों में बांट कर उसको कमजोर कर सको। यह कहते हुए वह भावुक हो गया और उसकी आंख से एक आंसू टपक कर जब जमीन की ओर बढ़ने लगा तो मैं चाहते हुए भी उसको अपने हाथों की हथेली पर सजा नहीं सका क्योंकि पत्रकारिता मेरी मजबूरी थी।
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शाहिद हसन शाहिद

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Sunday, December 20, 2020

मैं भी किसान हूं

अचानक मेरे अंदर का किसान जाग उठा और बाग़ियाना अंदाज में कहने लगा कि मैं भी किसान हूं और आंदोलन में शरीक होने के लिए सिंधु बॉर्डर पर जाना चाहता हूं।
मैंने उसको हैरत से देखा और पूछा तुम कब से किसान हो गए?
उसने भी मुझे प्रश्नवाचक नजरों से देखा और कहा- मैं तुम्हारे अंदर एक साहित्यकार की भूमिका में काफी समय से छवियां गढ़ने का रचनात्मक कार्य कर रहा हूं। भिन्न भिन्न प्रकार की पृष्ठ भूमियों पर चरित्र पैदा करके तुम्हारी कहानियों को जीवन्त करता रहा हूं। इसके पश्चात भी क्या मुझे यह बताने की आवश्यकता है कि मैं भी किसान हूं, तुमको ज्ञात होना चाहिए कि जो व्यक्ति किसी भी प्रकार से कुछ भी पैदा कर रहा है वह किसान है। मैं छवियां पैदा करने वाला किसान हूं और अपने किसान भाइयों के संघर्ष को बल देने के लिए संघर्ष स्थल पर जाना चाहता हूं। 
उसकी दलील सुनने के बाद मैंने कहा- मैं समझ गया गमले में पुदीने की खेती करने वाले किसान की तरह तुम भी एक किसान हो,पर इसके लिए संघर्ष का ही रास्ता क्यों?  
मुझे इस समय किसान कई वर्गों में बटे नज़र आ रहे हैं, एक वर्ग संघर्ष कर रहा है, जबकि दूसरा सम्मेलन। तुम सम्मेलन वाले किसान क्यों नहीं हो जाते जहां खतरा कम है कुछ ना करने के पश्चात भी रंग चोखा है।
संघर्ष का दूसरा नाम ही किसान है, सम्मेलन तो तुम्हारे जैसे साहित्यकार, राजनीतिक या मुद्दों से फरार होने वाले लोग करते हैं। उसने मेरे बग़ैर  मांगे सुझाव का उत्तर देते हुए कहा।
अब मैं समझा कि कुछ लोग किसानों को अर्बन नक्सल क्यों कह रहे हैं। मैंने एक बार फिर उसको अपने कटाक्ष के निशाने पर लेते हुए कहा। उसने मेरी बात सुनी अनसुनी करते कहा- मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है, लेकिन मैं यह जानता हूं कि तुम्हारी वे सब कहानियां जो तुमने समाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हुए लिखी हैं और जिस पर तुमको बड़ा गर्व है वे सब बकवास हैं। 
यह अचानक से मेरी कहानियां बकवास किस प्रकार हो गयीं उनको तो लोगों ने पसंद किया है उनकी प्रशंसा की है। मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा तो उसने कहा, बर्फ जैसी ठंडी रात में खुले आसमान के नीचे संघर्ष करने वाले किसानों के साथ ना तो तुमने अभी तक ठंडी चाय पी है और ना ही उनके साथ लकड़ी जलाकर अलाव पर हाथ तापें हैं। मैंने उसकी बात को बीच में ही रोकते हुए कहा कि देसी गीजर से हुए गरम पानी से नहाते हुए भी तुम ने मुझे नहीं देखा होगा। उसने कहा- ठीक है....! इन कड़े अनुभवों से जब तक तुम नहीं गुज़रोगे किसानों की ही नहीं किसी भी समाजिक संघर्ष की कहानी नहीं लिख सकते यह मेरा विश्वास है। मैंने संवाद को आगे बढ़ाते हुए कहा- लंगर में काजू किशमिश,बादाम और पिज़्ज़ा खाने के बाद जिम और मसाज का मज़ा लेने वाले किसानों के संघर्ष की कहानी मैं नहीं लिख सकता इतना सुनकर ही मेरा पेट खराब हो जाता है।
काजू बादाम सुनकर पेट नहीं खराब होता है किसानों के कंधों पर रखी वह अदृश्य बंदूक देखकर तुम्हारा पेट खराब हो जाता है जिसका भय दिखाकर सरकार विपक्ष को निशाना बना रही है। उसने तुरंत उत्तर देते हुए कहा।
यह बात तुमने ठीक कही, बंदूक जैसी कोई चीज इस संघर्ष में डराने का काम तो कर रही है यह मैं भी महसूस कर रहा हूं। 
मेरी बात सुनकर वह एक क्षण के लिए खामोश हुआ और फिर बोला कुछ लोगों कह रहे हैं कि किसानों को संयोजक ढंग से भ्रमित किया जा रहा है तुमने सुना और भय के कारण आंखें बंद कर लीं और खामोश हो गए परंतु जब किसानों ने कहा कि हमको भ्रष्टाचारी,आतंकवादी,अर्बन नक्सली,टुकड़े टुकड़े गैंग,देशद्रोही, खालिस्तानी और बारबाला एंटोनियो के गुलाम कहकर बहुत सी बंदूकों से गोलियां दागी जा रही हैं तो तुम किसानों पर लगाए गए पचास लाख के जुर्माने के ज़िरो गिन्ने में व्यस्त रहे। यह कहां का इंसाफ है अंतरात्मा भी कोई चीज होती है। इतना कहकर उसने मुझे सोचने के लिए छोड़ दिया। 
अब मैं सच कहूं तो सच्चाई यह है कि मेरे अंदर मौजूद किसान ने मुझे अंतरात्मा की उस कसौटी पर खड़ा कर दिया है जहां मेरे लिए यह फेसला करना मुश्किल है कि आंखों पर काली पट्टी बांधकर इंसाफ करने वाली देवी की जगह अगर मैं स्वयं होता तो मुझे किसान की मर्यादा पर चली गोलियां नज़र आतीं या छुपा हुआ वह एजंडा, जो किसान को किशमिश बादाम की जगह भविष्य में सूखे चने खाने पर मजबूर कर देगा।
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Thursday, December 10, 2020

ज़िद्दी बुड्ढा

मेरी पत्नी मेरी परवाह नहीं करती, मेरी बेटी मेरी बात नहीं सुनती, बेटा प्राय: मुझसे नाराज़ रहता है। बहू द्वारा मेरा निरादर करना आम 
बात है, करीबी रिश्तेदार मुझसे दूर भागते जा रहे हैं संक्षेप यह कि किसी के पास मेरे लिए ना तो समय है ना आदर-सम्मान। मोदी सरकार की तरह हो गया हूं मैं, कोई मुझसे खुश ही नज़र नहीं आता। जिसको देखो वह धरना प्रदर्शन कर रहा है। दिन प्रतिदिन दयनीय होती मेरी हालत पर लोग हंसते और मज़ाक उड़ाते तो नज़र आते हैं पर समाधान के लिए बढ़ते हाथ नज़र नहीं आते, बहुत तनाव भरी परिस्थितियों से गुजर रहा हूं मैं आजकल।
मेरे एक बुजुर्ग मित्र ने जब मुझसे अपना यह दर्द बयान किया तो मैं भावुक हो गया जबकि मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि इस आधुनिक मशीनी युग में इस बुजुर्ग की यह अकेली कहानी नहीं है यह कहानी तो अब घर घर की कहानी बन चुकी है, पता नहीं इस युग के बच्चों को यह क्या हो गया है कि वे अपने बुजुर्गों का आदर-सत्कार करना ही भूल गए हैं। 
टूटते रिश्तों और दम तोड़ती मर्यादा को पुनः स्थापित करने में अपनी भूमिका तलाश करते हुए मैंने उस बुजुर्ग से एक बुद्धिजीवी की तरह समझाया कि आप शब्दों की शक्ति को भूल गए हैं इसलिए दुखी हैं आप भूल गए हैं कि शब्द तोप और तलवार से भी अधिक शक्तिशाली होते हैं यह जानते हुए भी आपने तोप और तलवार तो उठा ली है और उन शब्दों को भूल गए हैं जो जख्मों पर मरहम से ज्यादा तेज काम करते हैं। मेरी बात सुनकर बुजुर्ग ने मुझे शक भरी नजरों से घूरते हुए कहा-तुम कहना क्या चाहते हो ?
मैंने विश्वास भरे स्वर में कहा-दुनिया की समस्त समस्याओं का हल चंद शब्दों के जादू में छुपा है। शब्दों से जादू करना सीख लीजिए और फिर देखिए चमत्कार कि किस प्रकार आप से नफ़रत करने वाले भी आपके प्रिय बन जाते हैं।
बुजुर्ग ने शक भरी नज़रों से मेरी ओर देखा, जैसे मैं कोई पेशावर जादूगर हूं, जो अपने शब्दों के जादू से जल्द ही अपनी जेब से खरगोश निकालकर उसे दिखा कर अचंभित कर दुंगा।
बुजुर्ग को आश्चर्य से देखते हुए मैंने पूछा- इस प्रकार क्यों देख रहे हैं, बात को समझिए लोगों के दरमियान समन्वय बनाने के लिए संवाद की आवश्यकता होती है और संवाद शब्दों से संभव होता है। आंकड़ों या इतिहास के पन्नों से नहीं। आपकी हर समस्या का हल शब्दों के इस जादू में छुपा है जो मैं आपको बताने वाला हूं।
बुजुर्ग ने जिज्ञासा से पूछा-वह जादुई मंत्र क्या है, जो मुझे नहीं आता और आप मुझे बताने वाले हैं।
मैंने कहा वह बहुत सरल है। आपको केवल कुछ शब्द अपने परिजनों से इस प्रकार कहना हैं कि मैंने तुम्हारी हर वह गलती जो तुमने मेरे आत्मसम्मान को पहुंचाई है उसके लिए मैं तुमको क्षमा कर रहा हूं अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, इन जादुई शब्दों के कहने के बाद आप कमाल देखिएगा कि किस प्रकार आपकी आत्मा पर आए सब घाव खुद-ब-खुद भर जाएंगे और आपके अपने आपको अपनी पलकों पर बिठाने के लिए विवश हो जाएंगे। आपको केवल अपने जादुई शब्दों पर पूरा उतरना पड़ेगा जो निस्वार्थ होंगे और याद रखना होगा कि किसी को क्षमा कर देना जीवन का वह मंत्र है जो जीवन को आशावादी व ऊर्जावान बना देता है। याद रखिए नाराज़गी का कारण दूसरे नहीं आप स्वयं होते हैं इसलिए पहल भी आपको स्वयं से ही करते हुऐ अपनी बहू, बेटी और पत्नी को उनकी गलतियों के लिए क्षमा करना होगा। इस प्रकार आप स्वयं को तनाव मुक्त कर पाएंगे। 
मेरे सकारात्मक सुझाव को बीच में रोकते हुए बुजुर्ग ने बड़ी हिकारत से मुझे देखा और अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेहराते हुए कहा- बातें बहुत अच्छी कर लेते हो परंतु वे स्वभाविक नहीं होती हैं, मैंने आश्चर्य से पूछा आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?
बुज़ुर्ग ने बड़ी सहजता के साथ कहा-मैं अपने परिजनों को अच्छी तरह जानता हूं आपका परामर्श मानकर अगर मैंने अपनी बहू बेटी और पत्नी से आपका बताया हुआ मंत्र कह भी दिया कि कोई बात नहीं मैंने तुम्हारी हर गलती के लिए तुमको क्षमा कर दिया है। अब मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है। सुख शांति बनाए रखो और आराम से रहो। जिसके उत्तर में उन्होंने पलटकर मुझसे यह कह दिया कि तुमसे क्षमा मांग कौन रहा है, ऐ- सटठियाए हुए बूढ़े और रही बात शिकायत की, तो वह हम सबको तुम से है, तुमको हमसे कोई शिकायत नहीं है, हम तो सामान्य तौर पर ही रह रहे हैं; परंतु तुमने अपने नए-नए नियमों व कानूनों से दुखी कर रखा है इसलिए हम तुमको माफ करने के बिल्कुल तैयार नहीं हैं। हमें तो सिर्फ तुमसे छुटकारा चाहिए।
इस परिस्थिति में आप अपने जादुई शब्दों को क्या नाम देंगे।
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शाहिद हसन शाहिद
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Monday, November 30, 2020

लव-जिहाद

मेरी चिंता का कारण यह नहीं है कि मुझे पेट भरने के लिए रोटी चाहिए, चिंता का कारण यह भी नहीं है कि मेरे सर पर छत का साया नहीं है, ना ही यह है कि मुझे शरीर ढकने के लिए कपड़े की आवश्यकता है। यह सब भौतिक सुविधाएं तो भगवान ने मुझे बेहिसाब दे रखी हैं। विलासिता पूर्ण जीवन, सुंदर व सुशील पत्नी, संस्कारी बच्चे, घनिष्ठ मित्रों की भीड़ के अतिरिक्त नौकरों की पूरी फौज,"जैसा आपका आदेश" कहने वाले 
जी-हज़ूर्ये, दूर वह क़रीब के रिश्तेदार, इज़्ज़त, दौलत हर प्रकार की चकाचौंध सब कुछ तो है मेरे पास फिर भी मैं मन से अशांत हूं। एक बेचैनी एक तनाव मैंने अपनी दौलत से खरीद रखा है, जो अब मेरा भाग्य बन चुका है और मैं अपने ही हाथ का खिलौना बन कर रह गया हूं।
पूरी पूरी रात जाग कर सीसीटीवी कैमरों द्वारा घर व बाहर की हलचल पर अपनी पत्नी, बहू,बेटियों और विशेषकर उस बड़ी-बड़ी स्टाइलिश मूछों वाले अपने पसंद के सिक्योरिटी गार्ड पर नज़र रखता हूं, जिसको विशेष तौर पर मैंने अपनी सुरक्षा के लिए नियुक्त किया है और जो हर समय हाथ बांधे मेरी सेवा में उपस्थित रहता है।
साहस, वीरता एवं पौरूष की प्रतीक उसकी मूछें दिन के समय मुझे और मेरे परिवार को प्रभावित वह उत्साहित रखती हैं। अपने सेवकों में मुझे वह पसंद भी अधिक है; परंतु रात आते ही उसकी शानदार मूछें मुझे लव-जिहाद के भूत की भांति डराने लगती हैं।
अपने कमरे के बाहर रात के समय जब मैं इन पहरेदार मूछों को अपनी व परिवार की सुरक्षा करते देखता हूं तो डर जाता हूं और भय के कारण पूरी-पूरी रात जागकर इन खतरनाक मूछों की मामूली सी मामूली हरकत पर नज़र रखता हूं ताकि यह मूछें कोई अनहोनी ना कर जाएं। मैं आपको सही बता रहा हूं कि मेरे मन ने इस अंजान भय को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि मेरी जरा सी भूल मेरे लिए काल बन सकती है और यह खतरनाक मूछें एक न एक रात कोई शिकार अवश्य कर डालेंगी।
इस खौफ के कारण ही मैं अपने कमरे में रखे सीसीटीवी मॉनिटर पर पूरी पूरी रात जाग कर नजरें जमाए बैठा रहता हूं ताकि ना निगाह हटेगी और ना दुर्घटना घटेगी।
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Friday, November 20, 2020

चटपटी चाट के पत्ते

मेरे दिल के डॉक्टर का कहना है कि मैं नमक और तेज मसालों का सेवन ना करूं क्योंकि मैं ब्लड प्रेशर का मरीज हूं।
हड्डियों का डॉक्टर कहता है कि दही,खट्टी- मीठी चटनी, छिलके दार दालें, दूध से तैयार किसी भी प्रकार के व्यंजन का सेवन ना करूं यह सब यूरिक एसिड उत्पन्न करते हैं। जिस कारण घुटनों का दर्द बढ़ जाता है।
मेरा अनुभव भी यही कहता है कि थोड़ा सा असंतुलित भोजन मेरे दिल की धड़कने तेज करने, सांस फूलने व घुटनों के दर्द को बढ़ाने के लिए प्रर्याप्त होता है।
स्वास्थ्य की इस खराब स्थिति के बावजूद, मैं अपनी फूली हुई सांस व एक वफादार दोस्त की तरह दिन-रात साथ रहने वाले अपने घनिष्ठ मित्र यानी घुटनों के दर्द के साथ नगर के मीना बाजार की मशहूर चाट वाली दुकान पर शाम होते ही पहुंच जाता हूं।
इस दुकान की चाट पापड़ी और गोलगप्पे अपने तीखे स्वाद और तेज़ मसालों के कारण शहर के चटोरों में काफी मशहूर हैं। दुकान पर स्वस्थ लोगों का हर समय मेला लगा रहता है।अब आप सोच रहे होंगे कि इन स्वस्थ चाट के चटोरों के बीच मेरा जैसा अस्वस्थ व्यक्ति जिस पर चाट खाने की पूर्णतः पाबंदी है वह अपने स्वास्थ्य का ख्याल ना रखते हुए चाट की दुकान पर जाने का जोखिम क्यों मोल लेता है? कौनसी ऐसी मजबूरी है कि बगैर चाट खाए यह व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता? चाट की दुकान से उठने वाले मसालों की सुगंध उससे कुछ भी अनर्थ करा सकती है। इन प्रश्नों के उत्तर में, मैं केवल इतना ही कहूंगा की चाट की दुकान पर जाना मेरी कोई मजबूरी नहीं है। मुझे स्वंय पर और अपनी ज़ुबान पर इतना यकीन और भरोसा है कि स्वादिष्ट चाट मेरी सेहत से खिलवाड़ करने का हौसला नहीं कर सकती। मेरे वहां जाने का कारण तो एक तलाश है जो मुझे उन गरीब बच्चों के दरमियान ले जाती है, जो चाट खाने की अपनी चाहत में अमीरों द्वारा फेंके चाट के झूठे पत्ते प्राप्त करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। नंग धड़ंग यह मासूम बच्चे अपनी फ्री स्टाइल कुश्ती दिखाते समय चोट भी खा जाते हैं फिर भी हार नहीं मानते और झूठे पत्तों को अपना हक़ समझते हुए अपनी जद्दोजहद में अपने ही भाइयों के साथ लड़ने का कौशल अमीरों को दिखाते नहीं थकते हैं, जबकि चाट खाने के शौकीन लोग अपने मनोरंजन के लिए अपने चाट के झूठे पत्ते उन बच्चों की ओर रुक-रुक कर फेंकते हैं, ताकि तमाशा जारी रहे। मैं तो केवल एक मुर्दा समाज की तरह यह देखने जाता हूं कि यह गरीब बच्चे कब बड़े होंगे और कब इस बात को समझेंगे कि उनकी गरीबी का मजाक उड़ाने वाले इन अमीरों के लिए वह कब तक मनोरंजन का साधन बनते रहेंगे। अमीरों की सोच में कब बदलाव आएगा यह मैं नहीं जानता या उन में कब कोई ऐसा अमीर पैदा होगा जो इस मनोरंजन के बाद या पहले इन बच्चों को एक चाट का पत्ता खिलाने का हौसला रखता हो यह भी मैैं नहीं जानता, हां...! यह अवश्य जानता हूं कि बच्चे गरीब हैं, पिछड़े हैं और जरूरतमंद हैं।अमीरों को सोचना चाहिए की चाट की खुशबू और चोट का दर्द तो सब को एक ही समान विचलित करता है चाहे वह अमीर हो या गरीब हो।

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Tuesday, November 10, 2020

मुझे इंटरव्यू देना है

साधू सा देखने वाला एक व्यक्ति मेरे कार्यालय मैं आया और कहने लगा- मुझे इंटरव्यू देना है, पत्रकार बुलाओ।
मैंने सर से पैर तक उसको कई बार देखा और मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह नया नया साधू बना है, पहले यह निश्चय ही मिडिल क्लास का रहा होगा, उसकी मनोस्तिथि देखते हुए मैंने उससे कहा दिया कि हम साधू-संतों के इंटरव्यू नहीं करते हैं। इतना सुनते ही वह क्रोधित हो गया और बिगड़ कर कहने लगा-
इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी कोई इज्जत ही नहीं है। उसके गुस्से को देखते हुए मैंने कहा- इज्जत है, परंतु वह 5 वर्ष बाद तुमको मिलती है अभी समय नहीं आया है,जब समय आएगा तो इज्जतदार लोग तुम्हारे दरवाजे पर इज्जत लेकर पहुंच जाएंगे उस समय तुम इज्जत दार बन जाना और इंटरव्यू देना। मेरा कटाक्ष सुन कर उसने शक भरी नज़रों से मुझे देखा और पूछा- तुम कौन हो? मैंने कहा- लेखक...! लेखक सुनते ही उसने बुरा सा मुंह बनाया और कहा- मुझे तुमसे बात नहीं करनी है, मुझे दबंग पत्रकार चाहिए, जो आंखों में आंखें डालकर कड़क आवाज मैं पूछ सके मुझे जवाब चाहिए। ऐसा पत्रकार बुलाओ। मैंने कहा- मैं पत्रकार भी हूं और लेखक भी टू इन वन। उसने टू इन वन पर गौर ना करते हुए कहा -लेखक पत्रकार नहीं हो सकता। उसका स्पष्ट विश्लेषण सुनकर मैंने कहा- अब लेखक और पत्रकार में कोई फर्क नहीं रह गया है, बड़े-बड़े नेताओं के इंटरव्यू अब लेखक ही पत्रकार बनकर कर रहे हैं और तुम कह रहे हो कि लेखक पत्रकार नहीं हो सकता
तुमको मालूम नहीं की देश बदल चुका है,अब लेखक ही नहीं फिल्मों के नायक भी इंटरव्यू करने लगे हैं।पत्रकार तो केवल अपने स्वामी द्वारा दिए हुए निर्देशों का पालन करते हुए केवल चीखने चिल्लाने तक ही सीमित रह गए हैं। अपनी बात बीच में रोकते हुए मैंने उससे कहा- छोड़ो इन बातों को तुम बताओ इंटरव्यू क्यों देना चाहते हो? उसने कहा- तुमने अभी कहा था कि देश बदल चुका है, जो गलत है, मैं कड़े शब्दों से इसका खंडन करता हूं ,देश नहीं बदला है, लोग बदल गए हैं। हमारे मालिक बदल गए हैं जिन्होंने या तो हमको देश के अमीरों को बेच दिया है या गिरवीं रख दिया है। मेरी गरीबी इसका सबूत है। पर इस समय मैं अपनी गरीबी पर बात करने नहीं आया हूं और ना ही यह बताने आया हूं कि मैं जन्मजात साधू नहीं हूं। मैं तुम्हारे कार्यालय में अपने साथ हुए धोखे पर बात करने आया हूं,उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने आया हूं। मैंने उसकी पीड़ा को समझते हुए सहानुभूति दिखायी और पूछा-तुम्हारी अपनी पहचान खत्म होने से भी ज्यादा बड़ा कोई और नया धोखा हुआ है ? उसने कहा हां...! आज सुबह ही हुआ है। मैंने पूछा कैसा धोखा हुआ है और किसने दिया है? उसने एक समाचार पत्र मुझे दिखाते हुए कहा- इस समाचार पत्र ने मुझे धोखा दिया है। मैंने समाचार पत्र हाथ में पकड़ते हुए पूछा- इसने क्या धोखा दिया है तुम को? उसने कहा- मैंने सुबह का नाश्ता नहीं किया है,चाय भी नहीं पी है। उसकी इन बातों का अर्थ ना समझते हुए मैंने पूछा- इसमें समाचार पत्र का क्या दोष है? उसने कहा-केवल ₹3 ही थे मेरे पास, मैंने चाय नहीं पी उन पैसों से समाचार पत्र खरीद लिया। अब तुम खुद ही देख लो,12 पन्नों के इस पत्र में 9 पन्नों पर पूरे पूरे पेज के विज्ञापन हैं जिन में अधिकतर में सरकार की उन नीतियों का उल्लेख है जो धरातल पर कहीं नहीं हैं, फिर उसने मेरी ओर देखा और कहा, हमारी कोई इज्जत ही नहीं है हमें फेक न्यूज़ बेची जा रही हैं। मैंने उसकी पूरी बात सुनने के बाद उस से कहा -तुम्हें समाचार पत्र नहीं खरीदना चाहिए था तुम इन पैसों की चाय पी लेते। उसने कहा मुझे अपने बच्चों की फिक्र है। तुम ही बताओ क्या हमारे बच्चों की सब आवश्यकताएं सन्यासी हो गई हैं। देश में सब कुछ ठीक चल रहा है। सब ने सुबह की चाय पी ली है। सबके हाथ में मिनरल वाटर की बोतलें थमा दी गई हैं। सबको भरपेट पिज़्ज़ा व फल फ्रूट मिल गए हैं। सब स्वस्थ हो गए हैं। सब बच्चे नौकरी करने लगे हैं। सबको कोरोना वैक्सीन मिल गई है। यही सब कुछ जानने के लिए मैंने समाचारपत्र खरीदा था परंतु वहां व्यवसाय और बाज़ारबाद तो मिला पर देश या उसकी मूल समस्याएं नहीं मिलीं। सब फ्रॉड है। मेरे ₹3 डूब गए।
अपनी सारी पूंजी डुबो देने वाले व्यक्ति का दुख सुनने के बाद मैं यह नहीं समझ पाया कि इसको किन शब्दों से समझाऊं कि हमारे देश ने विकास की जिस गति को अपनाया है उसमें गरीब या उसकी समस्याओं को कोई स्थान नहीं है, परंतु यह शब्द मैं उससे कह नहीं सका वह अब भी भावुक होते हुए यही कह रहा था कि मुझे इंटरव्यू देना है। पत्रकार बुलाओ। 
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शाहिद हसन शाहिद
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Sunday, November 1, 2020

पहचान कौन ?

पहचान तो लिया होगा....! दरवाजे पर खड़ी गेहूं के आटे से बनी रोटी ने मुझसे इस प्रकार पूछा,जैसे वह खाने लायक रोटी ना होकर तलाक शुदा पत्नी हो और कटाक्ष करते हुए पूछ रही हो, पहचान कौन ?
मैंने गंभीर होते हुए उससे कहा-पहचान लिया और क्यों नहीं पहचानूंगा ? तुम वही रोटी हो जिसने युगों-युगों से समय का पहिया थाम कर रखा है। जिसने अपना रुतबा फकीरों की कुटिया से राजाओं के महलों तक हमेशा बनाए रखने में सफलता प्राप्त की है। जिसके लिए बार-बार युद्ध लड़े गए हैं और आज भी लड़े जा रहे हैं। तुम्हारे ना मिलने से कई मानव जातियां भूख के समंद्र में गार्क होकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। मैं जानता हूं तुम वही हो जिसकी तलाश में लोग अपना देश,परिवार और अपनी पहचान तक छोड़ देते हैं। 
रोटी ने धैर्य के साथ अपनी प्रशंसा या कथा सुनी और कहा ठीक कह रहे हो तुम....! मेरी आवश्यकता हर समय हर व्यक्ति,हर समाज और हर जीवित प्राणी को रही है। मेरा महत्व कल भी था और आज भी है और भविष्य में भी इसी प्रकार बना रहेगा, तुम यह भी जानते हो की मुझे प्राप्त करने के लिए सख्त मेहनत की शर्त हमेशा रही है। परंतु समय के बदलाव के कारण अब उस शर्त के अतिरिक्त कुछ नए बदलाव आ गए हैं। इन नए बदलाव के कारण ही मुझे घर-घर जाकर लोगों से पूछना पड़ रहा है कि नई शर्तें पूरी करेंगे तभी मैं उनका पेट भरने का आश्वासन दूंगी। 
यह रूप रोटी का मैंने पहली बार देखा था कि वह घर घर जाकर पूछ रही थी कि मेरी आवश्यकता है,तो मेरी शर्तें पूरी करो,तभी मैं तुम्हारा पेट भरने के लिए तैयार हूंगी। इसका अर्थ यह हुआ कि दरवाजे- दरवाजे रोटी का भटकना स्मृद्धि या विकास का कारण नहीं है, जैसा कि पहले मेरे मन में विचार आया था या अनुभव था। यह एक लक्ष्य था जिसको प्राप्त करके ही रोटी गृह प्रवेश कर सकती थी। 
रोटी के इस रूप को देखकर मैं अचंभित हो उठा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं रोटी के प्रस्ताव पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया दूं। अमीर और गरीब का भेदभाव ना रखने वाली रोटी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा था कि वह पेट भरने के लिए मेहनत के अतिरिक्त किसी दूसरी शर्तों का सहारा ले रही हो। मेरे मन में एक प्रश्न आया और मैंने उससे पूछा- घर में प्रवेश के लिए मेहनत के अतिरिक्त और क्या शर्त है तुम्हारी?
रोटी ने स्वयं को हवा में लहराते हुए कहा- शर्त, अनिवार्य भी है, जो मेहनत द्वारा मुझे प्राप्त करने से अतिरिक्त है। इससे पहले तो मेहनत के अतिरिक्त कोई और शर्त तुमको पाने के लिए नहीं होती थी। मैंने तर्क देते हुए पूछा।
वह समय मूर्खों का था,अब समय बदल गया है, रोटी ने दो टुक जवाब देते हुए कहा।
मैं समझ गया मुझे अपना आधार कार्ड किसी संस्था के साथ लिंक कराना पड़ेगा। यह भी अनिवार्य है,इसके अतिरिक्त भी एक शर्त और है। रोटी ने अपने शब्दों पर जोर देते हुए उत्तर दिया। वह क्या है ? मैंने अचंभित होते हुए पूछा- उसने कहा राष्ट्रवाद साबित करने के लिए वंदे मातरम सुनाना अनिवार्य है। 
रोटी की शर्त सुनते ही मैं अचंभित रह गया। मुझे तुरंत अपने पड़ोसी का ख्याल आ गया जिसको वंदे मातरम नहीं आता था जबकि रोटी की उसे सख्त आवश्यकता थी। मैंने रोटी से कहा- तुम्हारी आवश्यकता मुझे भी है और मेरे पड़ोसी को भी है, परंतु तुम्हारी शर्त पूरी करने के लिए मुझे 2 दिन का समय चाहिए। रोटी ने मेरा चेहरा देखते हुए प्रश्न करते हुए पूछा- तुमको वंदे मातरम नहीं आता है, तुम समय क्यों चाहते हो? मैंने कहा-आता है परंतु मेरे पड़ोसी को नहीं आता है। मैं इन 2 दिनों में अपने पड़ोसी को वंदे मातरम याद करा दूंगा।
यह कहते हुए मुझे अपने शब्दों में खुशामद का भाव साफ नजर आ रहे थे जबकि रोटी का चेहरा भावहीन था किसी हिटलर की तरह।
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शाहिद हसन शाहिद
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