Friday, December 19, 2008

यादों की चादर


फिर गुज़र गए 24 घंटे
इस इंतज़ार में
वो आएंगे मेरे पास
मेरा हाल पूछेंगे और अपना सुनाएंगे
कुछ हौसला देंगे और कुछ ले जाएंगे
एक दूसरे का सहारा बनकर
दिए की लौ बढ़ाएंगे
12 घंटे के मुिश्कल सफ़र के बाद
मंज़िल आधी क़रीब आई
दिए ने अपनी लौ बढ़ाई
मेरे अपने
मेरे पास आए
वह ठहरे मेरे दिल के कमरों में
सोए सीने से लगकर, आराम बिस्तर पर
चिपके रहे रात भर यादों की चादर से
पर जैसे ही
घोड़ पर सवार एक मुसाफिर आया
मुदार् जिस्मों से उसने रोटी मांगी
उठे वो तेज़ी से
सिर ऊंचा करके और
चले गए बग़ैर मिले मुझसे
आंखें नीची करके
रोटी कमाने की जल्दी में
और छोड़ गए मुझको
एक बार फिर
अकेला, मायूस और उदास
इंतज़ार के मुिश्कल लम्हों में
अगले 24 घंटे के लिए

3 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

12 घंटे के मुिश्कल सफ़र के बाद
मंज़िल आधी क़रीब आई
दीपक ने अपनी लौ बढ़ाई
मेरे अपने
मेरे पास आए

बेहद ही खूबसूरत लिखा है आपने हसन साहब जी वैसे तो मैं आपकी कलम का कायल पहले से ही हूं नववर्ष की शुभकामनाएं

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन.........

अनिल कान्त : said...

ultimate ...superb

bahut khoobsurati se likha hai aapne

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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